श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 10: सकाम कर्म की प्रकृति  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  11.10.32 
यावत् स्याद् गुणवैषम्यं तावन्नानात्वमात्मन: ।
नानात्वमात्मनो यावत् पारतन्‍त्र्‍यं तदैव हि ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
जब तक जीव यह सोचता है कि प्रकृति के गुण अलग-अलग अस्तित्व रखते हैं, तब तक उसे अनेक रूपों में जन्म लेना ही होगा और उसे अनेक प्रकार के भौतिक जीवन का अनुभव करना ही होगा। इसलिए, जीव प्रकृति के गुणों के अधीन सकाम कर्मों पर पूरी तरह से निर्भर रहता है।
 
As long as the living entity thinks that the modes of nature have separate existences, he is bound to take birth in many forms and experience many kinds of material life. Therefore, the living entity is completely dependent on fruitive actions under the modes of nature.
तात्पर्य
शब्द गुण-वैषम्यम भगवान कृष्ण को भूल जाने की ओर संकेत करता है, जिसके कारण पदार्थ सम्बंधित विविधताओं को पृथक अस्तित्व की अवस्था के रूप में देखता है। भौतिक विभिन्नताओं के प्रति आकर्षित होनेवाला जीव और उनमें विश्वास रखने के कारण ये जीव विभिन्न भौतिक पिंडों में, जैसे देवताओं, सुअरों, व्यवसायियों, कीटों आदि इन विविधताओं का अनुभव करने के लिए बाध्य होता है। कर्म-मीमांसा के दार्शनिकों के अनुसार कोई भी पारलौकिक जीवित इकाई नहीं है जो सभी अस्तित्व की पृष्ठभूमि हो। वे भौतिक विविधता को अंतिम वास्तविकता के रूप में स्वीकार करते हैं। परन्तु, ईश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व, भगवान कृष्ण, सभी चीजों का वास्तविक आधार है। सब कुछ उसी के भीतर है, और वे सभी चीजों के भीतर हैं। भगवान के निष्कपट भक्त कृष्ण को हर जगह देखते हैं और प्रकृति की विविधतापूर्ण सारी विधाओं को भगवान कृष्ण की शक्ति के रूप में देखते हैं। जो कोई भी भगवान कृष्ण को नहीं देखता वह निश्चित रूप से भौतिक विविधता को सर्वोच्च वास्तविकता के रूप में देखेगा। इस तरह की दृष्टि को माया कहा जाता है, या स्थूल भ्रम, और यह एक जानवर की दृष्टि के समान है। पारतंत्र्यम का अर्थ है कि जब तक कोई व्यक्ति इस सतही, अलगाववादी दृष्टिकोण को नहीं त्यागता तब तक फलदायी गतिविधियों के जाल में फंसा रहेगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)