Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 11.10.26: जब तक उसके सत्कर्मों के पुण्यकारी परिणाम समाप्त नहीं हो जाते, तब तक यज्ञ करने वाला व्यक्ति स्वर्गीय ग्रहों में जीवन का आनंद लेता है। हालाँकि, जब पुण्यकारी फल समाप्त हो जाते हैं, तो वह स्वर्ग के बगीचों से नीचे गिर जाता है, जो शाश्वत समय तत्व का विरोध करता हुआ उसकी इच्छा के विरुद्ध होता है। | bhagavat अध्याय 11.10: सकाम कर्म की प्रकृति । bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तावत् स मोदते स्वर्गे यावत् पुण्यं समाप्यते ।
क्षीणपुण्य: पतत्यर्वागनिच्छन् कालचालित: ॥ २६ ॥
अनुवाद
जब तक उसके सत्कर्मों के पुण्यकारी परिणाम समाप्त नहीं हो जाते, तब तक यज्ञ करने वाला व्यक्ति स्वर्गीय ग्रहों में जीवन का आनंद लेता है। हालाँकि, जब पुण्यकारी फल समाप्त हो जाते हैं, तो वह स्वर्ग के बगीचों से नीचे गिर जाता है, जो शाश्वत समय तत्व का विरोध करता हुआ उसकी इच्छा के विरुद्ध होता है।
The sacrificer enjoys life in heaven until the fruits of his good deeds are exhausted. But when the fruits of his good deeds are exhausted, he is pushed down from the pleasure grounds of heaven against his will by the power of eternal time.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥