Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 11.10.25: यज्ञ का फल भोगने वाला, स्वर्ग की अप्सराओं के साथ, एक अद्भुत विमान में सवारी करता है, जो झुनझुनाहट वाली घंटियों से सजाया गया है और उसकी इच्छा अनुसार उड़ता है। वह स्वर्ग के बगीचों में आराम और खुशी का अनुभव करते हुए इस बात पर विचार नहीं करता कि वह अपने पुण्य कर्मों के फल को समाप्त कर रहा है और जल्द ही मृत्युलोक में गिर जाएगा। | bhagavat अध्याय 11.10: सकाम कर्म की प्रकृति । bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स्त्रीभि: कामगयानेन किङ्किणीजालमालिना ।
क्रीडन् न वेदात्मपातं सुराक्रीडेषु निर्वृत: ॥ २५ ॥
अनुवाद
यज्ञ का फल भोगने वाला, स्वर्ग की अप्सराओं के साथ, एक अद्भुत विमान में सवारी करता है, जो झुनझुनाहट वाली घंटियों से सजाया गया है और उसकी इच्छा अनुसार उड़ता है। वह स्वर्ग के बगीचों में आराम और खुशी का अनुभव करते हुए इस बात पर विचार नहीं करता कि वह अपने पुण्य कर्मों के फल को समाप्त कर रहा है और जल्द ही मृत्युलोक में गिर जाएगा।
The enjoyer of the fruits of the yajna goes for a ride along with the beauties of heaven in a wonderful plane which is decorated in a circular shape with tinkling bells and flies wherever he wants. While experiencing great comfort and pleasure in the gardens of heaven, he does not even think that he is ending the fruits of his good deeds and will soon fall into the mortal world.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥