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bhagavat 11.10.23: यदि पृथ्वी पर कोई व्यक्ति देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ यज्ञादि कर्मकांड संपन्न करता है तो वह स्वर्गलोक जाता है, जहाँ वह देवताओं की तरह अपने कर्मों से अर्जित सभी प्रकार के स्वर्गीय सुखों का भोग करता है।   |   bhagavat अध्याय 11.10: सकाम कर्म की प्रकृति   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 10: सकाम कर्म की प्रकृति  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  11.10.23 
इष्ट्वेह देवता यज्ञै: स्वर्लोकं याति याज्ञिक: ।
भुञ्जीत देववत्तत्र भोगान् दिव्यान् निजार्जितान् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
यदि पृथ्वी पर कोई व्यक्ति देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ यज्ञादि कर्मकांड संपन्न करता है तो वह स्वर्गलोक जाता है, जहाँ वह देवताओं की तरह अपने कर्मों से अर्जित सभी प्रकार के स्वर्गीय सुखों का भोग करता है।
 
If a person on earth performs Yajna to satisfy the Gods, he goes to heaven, where he, like the Gods, enjoys all kinds of heavenly pleasures earned by his own actions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)