श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 10: सकाम कर्म की प्रकृति  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  11.10.22 
अन्तरायैरविहितो यदि धर्म: स्वनुष्ठित: ।
तेनापि निर्जितं स्थानं यथा गच्छति तच्छृणु ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई व्यक्ति किसी भी दोष या अशुद्धि के बिना वैदिक यज्ञ और कर्मकांड को पूरा करता है, तो उसे अगले जन्म में स्वर्ग में स्थान प्राप्त होगा। लेकिन यह परिणाम, जो केवल कर्मकांड के पूर्ण प्रदर्शन के द्वारा प्राप्त किया जाता है, भी समय के द्वारा नष्ट हो जाएगा। अब इस बारे में सुनो।
 
If a person performs Vedic sacrifices and rituals without any mistake or sin, he will get a place in heaven in the next life. But this fruit obtained by rituals will also be destroyed by time. Now listen about this.
तात्पर्य
गच्छति शब्द का अर्थ "जाना" है। भगवद-गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, आगमापायिनो' नित्या: - सभी भौतिक अनुभव, अच्छे या बुरे, आते और जाते हैं। इसलिए, गच्छति शब्द निष्काम भाव से किये गए सर्वश्रेष्ठ कर्मों के फल के विनाश को दर्शाता है। चाहे जितनी बुरी या अच्छी क्यों न हो, कोई भी भौतिक स्थिति अपूर्ण है। इसलिए, व्यक्ति को केवल विशुद्ध कृष्ण चेतना का प्रयास करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)