ये कोपिता: सुबहु पाण्डुसुता: सपत्नै-
र्दुर्द्यूतहेलनकचग्रहणादिभिस्तान् ।
कृत्वा निमित्तमितरेतरत: समेतान्
हत्वा नृपान् निरहरत् क्षितिभारमीश: ॥ २ ॥
अनुवाद
क्योंकि पाण्डुपुत्र अपने शत्रुओं के अनेकानेक अपराधों से, जैसे कपटपूर्ण जुआ खेलना, बचनों द्वारा अपमान करना, द्रौपदी के केश खींचना और अन्य अनेक क्रूर अत्याचारों से क्रोधित थे, इसलिए भगवान ने उन पाण्डवों को अपनी इच्छा पूरी करने के लिए माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया। भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र युद्ध के कारण पृथ्वी पर बोझ बन रहे सभी राजाओं को अपनी-अपनी सेनाओं के साथ युद्ध के मैदान में दोनों ओर इकट्ठा होने की व्यवस्था की और जब भगवान ने उन्हें युद्ध के माध्यम से मार डाला, तो पृथ्वी का बोझ हल्का हो गया।
Since the sons of Pandu were enraged at the numerous crimes of their enemies, such as deceitful gambling, verbal insults, pulling of Draupadi's hair and many other cruel atrocities, the Supreme Lord used the Pandavas as a cause to fulfill His will. Under the pretext of the Kurukshetra war, Lord Krishna arranged to assemble all the kings, who were a burden on the earth, on both sides with their respective armies on the battlefield, and when the Lord killed them through war, the burden on the earth was lightened.
तात्पर्य
पाण्डवों को अपने दुश्मनों जैसे दुर्योधन और दुःशासन से बार-बार परेशान किया जाता था। निर्दोष युवा राजकुमारों के तौर पर, पाण्डवों का कोई दुश्मन नहीं था, लेकिन दुर्योधन अपने बेबस चचेरे भाइयों के खिलाफ लगातार साजिश रच रहा था। पाण्डवों को लाख के एक घर भेजा गया था, जिसे बाद में जला दिया गया था। उन्हें जहर दिया गया था, और उनकी पवित्र पत्नी द्रौपदी का सार्वजनिक रूप से अपमान किया गया था जब उनके बाल खींचे गये और उन्हें नंगा करने का प्रयास किया गया। इन सभी खतरों के दौरान, भगवान श्री कृष्ण ने लगातार पाण्डवों की रक्षा की, जो उनके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित थे और जिन्हें उनके अलावा कोई अन्य आश्रय नहीं पता था। इस श्लोक में 'इतरतरतः' शब्द महत्वपूर्ण है। कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले, कृष्ण ने व्यक्तिगत रूप से कई दानवों को मारा था, जिनमें पूतना, केशी, अघासुर और कंस शामिल थे। अब, कृष्ण अपनी मिशन को पूरा करना चाहते थे कि शेष दुष्ट व्यक्तियों को मारकर पृथ्वी के बोझ को हटाया जाए। लेकिन जैसा कि यहाँ कहा गया है, कृत्वा निमिट्त: भगवान ने स्वयं नहीं मारा, बल्कि अपने भक्तों अर्जुन और अन्य पाण्डवों को दुष्ट राजाओं को हटाने का अधिकार दिया। इस प्रकार व्यक्तिगत रूप से और अपने तात्कालिक विस्तार बलराम के माध्यम से कार्य करने के साथ-साथ पाण्डवों जैसे अपने शुद्ध भक्तों को अधिकार देकर, कृष्ण ने धार्मिक सिद्धांतों को फिर से स्थापित करके और दुनिया को राक्षसों से मुक्त करके युगावतार के मनोरंजनों को पूरी तरह से प्रदर्शित किया। यद्यपि कुरुक्षेत्र युद्ध का सामान्य उद्देश्य राक्षसों को मारना था, कृष्ण की व्यवस्था के द्वारा कुछ महान भक्त जैसे भीष्म भी प्रभु के प्रति द्वेषपूर्ण प्रतीत होते थे। लेकिन जैसा कि श्रीमद-भागवतम (1.9.39) के पहले कांड में 'हता गताः स्वरूपम' शब्दों द्वारा वर्णित किया गया है, कई महान भक्तों ने भगवान के साथ दुश्मनों के रूप में खेला और कृष्ण द्वारा मारे जाने पर तुरंत उनके मूल आध्यात्मिक शरीर में आध्यात्मिक आकाश में उनके निवास पर लौट आए। क्योंकि भगवान परम हैं, अपने मारने से वह एक साथ राक्षसों को पृथ्वी से हटाते हैं और अपने शुद्ध भक्तों को प्रोत्साहित करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥