अपने अंतर्धान से ठीक पहले, कृष्ण चाहते थे कि ऋषि यादव वंश के युवा सदस्यों पर क्रोधित हो जाएं, ताकि यह सिखाया जाए कि वैष्णवों को मूर्ख, अज्ञानी या सांसारिक नहीं माना जा सकता और अपने परिवार के सदस्यों के मिथ्या गर्व को कम किया जा सके। कभी-कभी भ्रमित व्यक्ति छद्म भक्तों की भूमिकाएँ ग्रहण करते हैं और शुद्ध भक्ति सेवा की वास्तविक प्रक्रिया और शुद्ध भक्तों की निंदा करते हैं जो भगवान के मिशन का प्रचार करने के लिए समर्पित हैं। ऐसे मूर्ख छद्म भक्त सोचते हैं कि भगवान के वास्तविक प्रचार मिशन के प्रति उनकी घृणा या ईर्ष्या भक्ति का गठन करती है, लेकिन वास्तव में यह उनके और उनके दुर्भाग्यपूर्ण लोगों दोनों के लिए सभी परेशानी का कारण बनता है जो उनका अनुसरण करते हैं। शुद्ध भक्ति सेवा के प्रचारक छद्म भक्तों के घातक प्रयासों को उजागर करते हैं, और इसी तरह नारद के नेतृत्व वाले ऋषि, जो भगवान के सभी श्रेष्ठ भक्त थे, ने यादव वंश के युवा लड़कों को विह्वल मूर्ख कहकर संबोधित किया और उनसे कहा, "इस झूठे गर्भ या साधु की झूठी पोशाक के भीतर एक क्लब जन्म लेगा जो आपके वंश का स्रोत होगा।" विनाश। "
विशेष रूप से भारत में, लेकिन अब पश्चिमी देशों में भी, प्रदूषित इंद्रिय भोगियों का एक वर्ग है जो खुद को गौड़ीय वैष्णव भी कहते हैं और प्रेम-भक्ति की उच्चतम अवस्था प्रदर्शित करने का दिखावा करते हैं। वे घोषणा करते हैं कि वे भक्ति की उच्चतम अवस्था पर हैं और इसलिए केवल माधुर्य-लीला के सबसे अंतरंग मामलों से ही संबंधित हैं, जैसा कि वृंदावन में प्रदर्शित किया गया है। कभी-कभी वे गोपियों के रूप में भी कपड़े पहनते हैं, जो वास्तव में मानक नियमों का पालन किए बिना कृष्ण के मनोरंजनों में प्रवेश करने का झूठा प्रदर्शन करते हैं। कभी-कभी प्रेम-भक्ति के नाम पर वे कृष्ण के शुद्ध भक्तों के विरुद्ध जघन्य अपराध करते हैं। सांबा के तथाकथित गर्भ से लोहे के क्लब से संबंधित इस घटना से, भगवान कृष्ण ने खुद ही ऐसे छद्म भक्ति के खतरनाक परिणामों को सिखाया।
