श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 1: यदुवंश को शाप  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  11.1.10 
श्रीबादरायणिरुवाच
बिभ्रद् वपु: सकलसुन्दरसन्निवेशं
कर्माचरन् भुवि सुमङ्गलमाप्तकाम: ।
आस्थाय धाम रममाण उदारकीर्ति:
संहर्तुमैच्छत कुलं स्थितकृत्यशेष: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : पृथ्वी पर रहने के दौरान भगवान ने अपनी समस्त शुभ इच्छाओं को पूरा कर लिया था। फिर भी उन्होंने अपने सुंदर शरीर के साथ कर्तव्यपरायणता से सबसे शुभ कार्यों को पूरा किया। अपने निवास में रहते हुए और जीवन का आनंद लेते हुए, भगवान, जिनकी महिमा स्वयं उदार है, ने अपने वंश को नष्ट करने का निश्चय किया क्योंकि उन्हें अभी भी कुछ कर्तव्यों को पूरा करना बाकी था।
 
Sukadeva Gosvami said: The Lord, who has assumed in His body a mixture of all beautiful things, dutifully performed very auspicious activities while on earth, although He had already fulfilled all His desires without any effort. Now, while living in His abode and enjoying life, the Lord, whose praises are themselves generous, wanted to destroy His lineage, because He still had some little work to perform.
तात्पर्य
इस श्लोक में परीक्षित महाराज के इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है कि यादव वंश के शक्तिशाली सदस्यों को ब्राह्मणों द्वारा शाप दिया गया था और इस तरह भ्रातृघाती युद्ध में वे अपने आप को कैसे नष्ट कर सकते हैं। शब्दों द्वारा संहरतुम् ऐच्छत कुलम् यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्वयं भगवान कृष्ण ने अपने वंश को वापस लेने की इच्छा की और इसलिए उन्होंने ब्राह्मणों को अपने एजेंट के रूप में नियुक्त किया। विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने यहां टिप्पणी की है कि कृष्ण ने पृथ्वी के सभी निवासियों के लिए अपने व्यक्तिगत रूप, व्यक्तित्व और सुख की अपरिवर्तनीय सुंदरता और शक्ति को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया था। इस प्रकार राक्षसों को मारने, भक्तों को बचाने और धार्मिक सिद्धांतों को फिर से स्थापित करने का उनका अवतार पूरी तरह से सफल रहा था। जब भगवान कृष्ण ने देखा कि उनका मिशन अब पूरा हो गया है, हर चीज पूरी तरह से हो गई है, उन्होंने वृष्णियों के साथ अपने पारलौकिक निवास पर लौटने की इच्छा की। इस प्रकार भगवान ने व्यक्तिगत रूप से यादव वंश को ब्राह्मणों द्वारा शापित करने की व्यवस्था की।

विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, आप्त-काम का अर्थ है कि कृष्ण हमेशा आत्म-संतुष्ट हैं, और फिर भी अपने पारलौकिक व्यक्तित्व को निष्पादित करने के लिए उन्होंने तीन विशिष्ट उद्देश्यों के लिए अपने खुद के वंश को नष्ट करने की व्यवस्था की, अर्थात्, स्वर्ग में रहने वाले उन सभी देवताओं को फिर से स्थापित करना जो यदुओं के बीच उनकी सहायता के लिए जन्म ले चुके थे, अपने पूर्ण विष्णु विस्तार को उनके निवासों में पुनः स्थापित करना, जैसे कि वैकुंठ , श्वेतद्वीप और बद्रीकाश्रम, और अपने शाश्वत सहयोगियों के साथ भौतिक दुनिया की दृष्टि से खुद को हटाना।

इस संबंध में, भक्तिसिद्धांत सरस्वती ने यादव वंश के विनाश के बारे में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। वह कहते हैं कि कई तथाकथित धार्मिक व्यक्ति पवित्र नाम का जाप करने के खिलाफ दूसरे अपराध करने के द्वारा गिर चुके हैं, अर्थात् विष्णौ सर्वेश्वरेषे तद-तर-सम-धीः, किसी अन्य जीवित व्यक्ति को भगवान विष्णु के बराबर मानना, जो कि भगवान हैं। भगवान का। जो मायावाद दर्शन की अवैयक्तिक प्रवृत्ति से पकड़ा जाता है वह झूठा सोचता है कि भगवान की बाहरी, भौतिक ऊर्जा उनकी आंतरिक, आध्यात्मिक शक्ति के बराबर है। इस तरह, कोई भी सामान्य जीवित प्राणियों को ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के साथ समान करता है, कृष्ण को माया के दूसरे पहलू के रूप में लेता है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण गलत धारणा है, क्योंकि यह भगवान को वास्तव में जैसा है उसे समझने के अवसर को खराब करता है।

जीवन की इस भ्रामक अवधारणा की ओर झुकाव रखने वाले व्यक्ति निस्संदेह यादव वंश के सदस्यों को कृष्ण के सभी मामलों में समान मानते थे और कृष्ण के परिवार के भावी वंशजों की पूजा कृष्ण के बराबर ही करते थे। इस प्रकार पृथ्वी पर यादव वंश की निरंतर उपस्थिति निश्चित रूप से आध्यात्मिक समझ के मार्ग पर एक बड़ी बाधा और पृथ्वी पर एक बड़ा बोझ बनेगी। विष्णु को विष्णु के परिवार के साथ बराबर करने के अपराध से दुनिया को होने वाले खतरे का मुकाबला करने के लिए, प्रभु ने यादव परिवार को कुचलने का फैसला किया।

सर्वोच्च भगवान, श्री कृष्ण, हमेशा अपने भक्तों के प्रति स्नेही होते हैं, लेकिन जब भी भगवान कृष्ण के पारिवारिक वंशज उनके प्रति शत्रुतापूर्ण या उदासीन हो जाते हैं, उनके शुद्ध भक्तों से प्यार नहीं करते हैं या अपने सेवकों के साथ दोस्ती नहीं करते हैं, तो भगवान के ऐसे तथाकथित परिवार के सदस्य उनकी इच्छा के लिए बाधा बन जाते हैं। एक ठोस खतरा है कि अज्ञानी जीवित प्राणी ऐसे शत्रुतापूर्ण व्यक्तियों की पूजा करेंगे, जो कृष्ण के करीबी सहयोगी हैं। उदाहरण के लिए, कंस को कृष्ण का मामा और इसलिए कृष्ण का एक वफादार नौकर मानना ​​एक पूरी तरह से गलत निष्कर्ष होगा। इस तरह की गलतफहमी से, प्रभु का विरोध करने वाले दुष्ट लोगों को उनके अंतरंग सहयोगियों के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, और कृष्ण के शत्रुओं को उनके आत्मसमर्पित आश्रितों के रूप में सोचा जा सकता है जो उनके अपने परिवार में दिखाई देते हैं। यादव वंश के विनाश का उद्देश्य मायावादियों के झूठे तर्क को मिटाना था जो हर चीज को सभी मामलों में एक जैसा देखना चाहते हैं और इसलिए अनुचित तर्क देते हैं कि कृष्ण के भक्तों के दुश्मन उनके अंतरंग परिवार के सदस्य हो सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)