विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, आप्त-काम का अर्थ है कि कृष्ण हमेशा आत्म-संतुष्ट हैं, और फिर भी अपने पारलौकिक व्यक्तित्व को निष्पादित करने के लिए उन्होंने तीन विशिष्ट उद्देश्यों के लिए अपने खुद के वंश को नष्ट करने की व्यवस्था की, अर्थात्, स्वर्ग में रहने वाले उन सभी देवताओं को फिर से स्थापित करना जो यदुओं के बीच उनकी सहायता के लिए जन्म ले चुके थे, अपने पूर्ण विष्णु विस्तार को उनके निवासों में पुनः स्थापित करना, जैसे कि वैकुंठ , श्वेतद्वीप और बद्रीकाश्रम, और अपने शाश्वत सहयोगियों के साथ भौतिक दुनिया की दृष्टि से खुद को हटाना।
इस संबंध में, भक्तिसिद्धांत सरस्वती ने यादव वंश के विनाश के बारे में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। वह कहते हैं कि कई तथाकथित धार्मिक व्यक्ति पवित्र नाम का जाप करने के खिलाफ दूसरे अपराध करने के द्वारा गिर चुके हैं, अर्थात् विष्णौ सर्वेश्वरेषे तद-तर-सम-धीः, किसी अन्य जीवित व्यक्ति को भगवान विष्णु के बराबर मानना, जो कि भगवान हैं। भगवान का। जो मायावाद दर्शन की अवैयक्तिक प्रवृत्ति से पकड़ा जाता है वह झूठा सोचता है कि भगवान की बाहरी, भौतिक ऊर्जा उनकी आंतरिक, आध्यात्मिक शक्ति के बराबर है। इस तरह, कोई भी सामान्य जीवित प्राणियों को ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के साथ समान करता है, कृष्ण को माया के दूसरे पहलू के रूप में लेता है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण गलत धारणा है, क्योंकि यह भगवान को वास्तव में जैसा है उसे समझने के अवसर को खराब करता है।
जीवन की इस भ्रामक अवधारणा की ओर झुकाव रखने वाले व्यक्ति निस्संदेह यादव वंश के सदस्यों को कृष्ण के सभी मामलों में समान मानते थे और कृष्ण के परिवार के भावी वंशजों की पूजा कृष्ण के बराबर ही करते थे। इस प्रकार पृथ्वी पर यादव वंश की निरंतर उपस्थिति निश्चित रूप से आध्यात्मिक समझ के मार्ग पर एक बड़ी बाधा और पृथ्वी पर एक बड़ा बोझ बनेगी। विष्णु को विष्णु के परिवार के साथ बराबर करने के अपराध से दुनिया को होने वाले खतरे का मुकाबला करने के लिए, प्रभु ने यादव परिवार को कुचलने का फैसला किया।
सर्वोच्च भगवान, श्री कृष्ण, हमेशा अपने भक्तों के प्रति स्नेही होते हैं, लेकिन जब भी भगवान कृष्ण के पारिवारिक वंशज उनके प्रति शत्रुतापूर्ण या उदासीन हो जाते हैं, उनके शुद्ध भक्तों से प्यार नहीं करते हैं या अपने सेवकों के साथ दोस्ती नहीं करते हैं, तो भगवान के ऐसे तथाकथित परिवार के सदस्य उनकी इच्छा के लिए बाधा बन जाते हैं। एक ठोस खतरा है कि अज्ञानी जीवित प्राणी ऐसे शत्रुतापूर्ण व्यक्तियों की पूजा करेंगे, जो कृष्ण के करीबी सहयोगी हैं। उदाहरण के लिए, कंस को कृष्ण का मामा और इसलिए कृष्ण का एक वफादार नौकर मानना एक पूरी तरह से गलत निष्कर्ष होगा। इस तरह की गलतफहमी से, प्रभु का विरोध करने वाले दुष्ट लोगों को उनके अंतरंग सहयोगियों के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, और कृष्ण के शत्रुओं को उनके आत्मसमर्पित आश्रितों के रूप में सोचा जा सकता है जो उनके अपने परिवार में दिखाई देते हैं। यादव वंश के विनाश का उद्देश्य मायावादियों के झूठे तर्क को मिटाना था जो हर चीज को सभी मामलों में एक जैसा देखना चाहते हैं और इसलिए अनुचित तर्क देते हैं कि कृष्ण के भक्तों के दुश्मन उनके अंतरंग परिवार के सदस्य हो सकते हैं।
