अपने पूजनीय प्रभु के चरण-कमलों में दशम स्कंध पर अपनी टीकाएं विनम्रतापूर्वक अर्पित करते हुए, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती प्रार्थना करते हैं:
मद्-गवीरपि गोपालः
स्वीकुर्यात् कृपया यदि
तदैवासां पयः पीत्वा
हृषयेयुस्तत्प्रिया जनाः
"यदि गोपाल प्रभु मेरे शब्दों-स्वरूप गायों को कृपापूर्वक स्वीकार कर लेंगे, तो उनके प्रिय भक्त उनके दूध- उनके श्रवण द्वारा प्राप्त अमृत- का पान करके आनंदित हो सकते हैं।"
