श्रील प्रभुपाद कृष्ण में इस श्लोक को इस प्रकार समझाते हैं: "श्रील शुकदेव गोस्वामी भगवान कृष्ण की अति-उत्कृष्ट स्थिति का वर्णन करते हुए इस प्रकार उनका गौरव करते हैं: 'हे भगवान कृष्ण, आपको सभी महिमाएँ। आप परमात्मा के रूप में हर किसी के हृदय में विराजमान हैं। इसलिए आपको जनिवासा के नाम से जाना जाता है, वह जो हर किसी के हृदय में निवास करते हैं।' जैसा कि भगवद्-गीता में पुष्टि की गई है, ईश्वरः सर्व-भूतानां हृद-देशेऽर्जुन तिष्ठति: 'परमात्मा रूप में सर्वोच्च भगवान हर किसी के हृदय में निवास करते हैं।' हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कृष्ण का भगवान के रूप में कोई अलग अस्तित्व नहीं है। मायावादी दार्शनिक परब्रह्म की सर्व-व्याप्त विशेषता को स्वीकार करते हैं, लेकिन जब परब्रह्म, या सर्वोच्च भगवान, प्रकट होते हैं, तो वे सोचते हैं कि वे भौतिक प्रकृति के नियंत्रण में प्रकट होते हैं। क्योंकि भगवान कृष्ण देवकी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए थे, मायावादी दार्शनिक कृष्ण को एक साधारण जीवित इकाई मानते हैं जो इस भौतिक संसार में जन्म लेती है। इसलिए शुकदेव गोस्वामी उन्हें चेतावनी देते हैं: देवकी-जन्म-वाद, जिसका अर्थ है कि यद्यपि कृष्ण देवकी के पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हैं, वास्तव में वे अध्यात्म हैं, या सर्वव्यापी सर्वोच्च भगवान हैं।
“हालाँकि, भक्त इस शब्द देवकी-जन्म-वाद को एक अलग तरीके से लेते हैं। भक्त समझते हैं कि वास्तव में कृष्ण माता यशोदा के पुत्र थे। यद्यपि कृष्ण सबसे पहले देवकी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए, लेकिन उन्होंने तुरंत माता यशोदा की गोद में चले गए, और उनके बचपन की लीलाओं का आनंद माता यशोदा और नंद महाराज ने लिया। इस तथ्य को स्वयं वसुदेव ने भी स्वीकार किया था जब वे कुरुक्षेत्र में नंद महाराज और यशोदा से मिले थे। उन्होंने स्वीकार किया कि कृष्ण और बलराम वास्तव में माता यशोदा और नंद महाराज के पुत्र थे। वसुदेव और देवकी केवल उनके औपचारिक माता और पिता थे। उनके वास्तविक पिता और माता नंद और यशोदा थे। इसलिए शुकदेव गोस्वामी भगवान कृष्ण को देवकी-जन्म-वाद के रूप में वर्णित करते हैं।
"फिर शुकदेव गोस्वामी भगवान को यदु-वर-परिषत, यदु वंश की सभा में सम्मानित होने वाले और विभिन्न प्रकार के राक्षसों के हत्यारे के रूप में महिमामंडित करते हैं। कृष्ण, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व, विभिन्न भौतिक ऊर्जाओं को नियोजित करके सभी राक्षसों को मार सकते थे, लेकिन वे उन्हें उद्धार देने के लिए व्यक्तिगत रूप से मारना चाहते थे। राक्षसों को मारने के लिए कृष्ण के इस भौतिक संसार में आने की कोई आवश्यकता नहीं थी। केवल अपनी इच्छा से, उनके व्यक्तिगत प्रयास के बिना, कई सैकड़ों और हजारों राक्षसों को मारा जा सकता था। लेकिन वास्तव में वे अपने शुद्ध भक्तों के लिए उतरे, माता यशोदा और नंद महाराज के साथ एक बच्चे के रूप में खेलने और द्वारका के निवासियों को खुशी देने के लिए। राक्षसों को मारकर और भक्तों को सुरक्षा देकर, भगवान कृष्ण ने वास्तविक धार्मिक सिद्धांत की स्थापना की, जो कि केवल ईश्वर का प्रेम है। प्रेम के तथ्यात्मक धार्मिक सिद्धांतों का पालन करके, स्थिर-चर नामक जीवित संस्थाओं को भी सभी भौतिक संदूषण से मुक्ति मिली और उन्हें आध्यात्मिक राज्य में स्थानांतरित कर दिया गया। स्थिर का अर्थ है पेड़ और पौधे, जो हिल नहीं सकते हैं, और चर का अर्थ है चलने वाले जानवर, विशेष रूप से गायें। जब कृष्ण उपस्थित थे, तब उन्होंने सभी पेड़ों, बंदरों और अन्य पौधों और जानवरों को मुक्त कर दिया जो उन्हें देखने और वृंदावन और द्वारका दोनों में उनकी सेवा करने के लिए हुए थे।
"भगवान कृष्ण विशेष रूप से गोपियों और द्वारका की रानियों को आनंद देने के लिए महिमामंडित हैं। शुकदेव गोस्वामी ने भगवान श्री कृष्ण की मनमोहक मुसकान के लिए उनकी महिमा की, जिससे उन्होंने न केवल वृंदावन की गोपियों को बल्कि द्वारका की रानियों को भी आकर्षित किया। इस संबंध में प्रयुक्त सटीक शब्द हैं वर्धयन कामदेवम्। वृंदावन में, कई गोपियों के प्रेमी के रूप में, और द्वारका में, कई रानियों के पति के रूप में, कृष्ण ने उनके साथ आनंद लेने की उनकी कामुक इच्छाओं को बढ़ाया। ईश्वर-साक्षात्कार या आत्म-साक्षात्कार के लिए, आम तौर पर किसी को कई-कई हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या और दंड का सामना करना पड़ता है, और तब ईश्वर को साकार करना संभव हो सकता है। लेकिन गोपियों और द्वारका की रानियों ने कृष्ण को अपने प्रेमी या पति के रूप में आनंद लेने की अपनी कामुक इच्छाओं को बढ़ाकर, केवल उच्चतम प्रकार का उद्धार प्राप्त किया।" इस तरह से श्रील प्रभुपाद ने शुकदेव गोस्वामी के इस छंद के अर्थ को आश्चर्यजनक रूप से प्रकाशित किया, जो भगवान कृष्ण के लीलाओं का सारांश प्रस्तुत करता है।
