श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती टिप्पणी करते हैं कि इन श्रेष्ठ महिलाओं द्वारा प्राप्त परम लक्ष्य निर्गुण योगियों की मुक्ति नहीं थी, बल्कि प्रेम-भक्ति की पूर्ण स्थिति, शुद्ध प्रेममय भक्ति थी। वास्तव में, चूँकि वे पहले से ही शुरू से ही ईश्वर के दिव्य प्रेम से ओतप्रोत थीं, इसलिए उनके पास अनंत काल, ज्ञान और आनंद के दिव्य शरीर थे, जिसमें वे परम भगवान के साथ उनके सबसे अंतरंग, मधुर लीलाओं में पारस्परिकता के आनंद का पूरा आनंद लेने में सक्षम थीं। विशेष रूप से, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती की राय में, ईश्वर के प्रति उनका प्रेम शुद्ध प्रेम (भावोनमद) में पागलपन के उन्माद में परिपक्व हो गया, ठीक वैसे ही जैसे गोपियों का प्यार तब था जब रास नृत्य के दौरान कृष्ण उनके बीच से गायब हो गए थे। उस समय गोपियों ने उन्मादपूर्ण पागलपन के पूर्ण विकास का अनुभव किया, जिसे उन्होंने जंगल के विभिन्न प्राणियों से अपनी पूछताछ में और ऐसे शब्दों में व्यक्त किया जैसे कृष्णोऽहं पश्यत गतिम्: "मैं कृष्ण हूँ! बस देखो मैं कितनी सुंदरता से चलता हूँ!" (भाग। 10.30.19) इसी तरह, द्वारकाधीश की प्रमुख रानियों के उन्मादपूर्ण प्रेम की विलास या उत्कर्षशील परिवर्तन ने प्रेम-वैचित्र्य के लक्षणों को जन्म दिया है जिन्हें उन्होंने यहाँ प्रदर्शित किया है।
