श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 90: भगवान् कृष्ण की महिमाओं का सारांश  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  10.90.15 
महिष्य ऊचु:
कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे
स्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्तबोध: ।
वयमिव सखि कच्चिद् गाढनिर्विद्धचेता
नलिननयनहासोदारलीलेक्षितेन ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
रानियाँ बोलती हैं: हे कुररी पक्षी, तू इस प्रकार विलाप क्यों कर रही है? देख, रात हो गयी है और भगवान् इस संसार के किसी गोपनीय स्थान पर विश्राम कर रहे हैं। परंतु हे सहेली, तुम जाग रही हो और नींद नहीं आ रही। क्या तुम भी हमारी ही तरह कमल-नयन भगवान् की दिलकश और चंचल मुस्कुराहटों से अपने हृदय के मध्य तक विदीर्ण हो गयी हो?
 
The queens said: O Kurri bird, you are lamenting. It is night now and the Lord is sleeping somewhere in a secret place in this world. But O friend, you are awake and unable to sleep. Is it possible that like us, your heart has been deeply pierced by the lotus-eyed Lord's generous, playful, smiling glance?
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती व्याख्या करते हैं कि रानियों का अलौकिक पागलपन (उन्माद) उन्हें ऐसी परमानंद से भर देता है कि वे दूसरों और हर चीज़ में अपने स्वयं के मनोदशा को प्रतिबिंबित होते देखते हैं। यहां वे कुरारी पक्षी को इंगित करते हैं, जो उन्हें भगवान कृष्ण से अलग होने पर शोक करते हुए पाते हैं। वे यह कहकर कुरारी को चेतावनी देते हैं कि अगर भगवान का वास्तव में उस या स्वयं के लिए कोई सरोकार होता, तो वह उस समय आराम से नहीं सो रहे होते। वे भगवान कृष्ण से उनके विलाप को सुनने और कुछ दया दिखाने की उम्मीद नहीं करने की चेतावनी देते हैं। यदि कुरारी सोचती है कि कृष्ण अपनी रानियों के साथ सो रहे हैं, तो वे इस बात से इनकार करते हुए कहते हैं कि वह गुप्त-बोध हैं: उनका ठिकाना अज्ञात है। वह आज रात कहीं दुनिया में हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं है कि उन्हें खोजना कहाँ जाना है। ओह प्रिय पक्षी, वे कहते हैं, भले ही आप एक साधारण प्राणी हैं, तुम्हारा दिल हमारे जैसा ही गहराई से छलनी हो गया है। तब तुम्हारा हमारे कृष्ण के साथ कुछ संपर्क अवश्य हुआ होगा। उसे छोड़ने की तुम्हें कोई उम्मीद क्यों नहीं है?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)