श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 90: भगवान् कृष्ण की महिमाओं का सारांश  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  10.90.14 
ऊचुर्मुकुन्दैकधियो गिर उन्मत्तवज्जडम् ।
चिन्तयन्त्योऽरविन्दाक्षं तानि मे गदत: श‍ृणु ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
रानियाँ भाव-विभोर होकर आत्मविस्मृति में डूब जाती थीं, और उनके मन सिर्फ और सिर्फ कृष्ण में ही लग जाते थे। तब वो अपने कमल नेत्रों वाले प्रभु के बारे में सोचते हुए, इस तरह से बोलती थीं मानो वो पागल हो गई हों। कृपया इन शब्दों को मुझसे सुनें, जैसे-जैसे मैं उन्हें बता रहा हूँ।
 
The queens would become numb in ecstatic self-forgetfulness and their minds would be absorbed in Krishna alone. Then, they would speak as if mad (mad), thinking of the Lord with their lotus eyes. Please hear these words from me as I tell them.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि भगवान कृष्ण की रानियों में पागलपन की यह सतही उपस्थिति, मानों जैसे वे धतूरे या किसी अन्य मतिभ्रमकारी दवा के नशे में हो गई हों, वास्तव में ईश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम की छठी प्रगतिशील अवस्था की अभिव्यक्ति थी, जिसे तकनीकी रूप से प्रेम-वैचित्र्य के रूप में जाना जाता है। श्रील रूप गोस्वामी ने अपने उज्ज्वल-नीलमणि (15.134) में अनुराग की इस विविधता को संदर्भित किया है:

प्रियस्य सन्निकर्षेऽपि

प्रेमोत्कर्ष-स्वभावतः

या विश्लेष-धियार्तिस् तत्

प्रेम-वैचित्र्यं उच्यते

"जब, किसी के अत्यधिक प्रेम के एक प्राकृतिक परिणाम के रूप में, वह प्रियतम की प्रत्यक्ष उपस्थिति में भी विरह का कष्ट महसूस करता है, तो इस स्थिति को प्रेम-वैचित्र्य कहा जाता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)