श्रीशुक उवाच
सुखं स्वपुर्यां निवसन् द्वारकायां श्रिय: पति: ।
सर्वसम्पत्समृद्धायां जुष्टायां वृष्णिपुङ्गवै: ॥ १ ॥
स्त्रीभिश्चोत्तमवेषाभिर्नवयौवनकान्तिभि: ।
कन्दुकादिभिर्हर्म्येषु क्रीडन्तीभिस्तडिद्द्युभि: ॥ २ ॥
नित्यं सङ्कुलमार्गायां मदच्युद्भिर्मतङ्गजै: ।
स्वलङ्कृतैर्भटैरश्वै रथैश्च कनकोज्ज्वलै: ॥ ३ ॥
उद्यानोपवनाढ्यायां पुष्पितद्रुमराजिषु ।
निर्विशद् भृङ्गविहगैर्नादितायां समन्तत: ॥ ४ ॥
रेमे षोडशसाहस्रपत्नीनामेकवल्लभ: ।
तावद्विचित्ररूपोऽसौ तद्गेहेषु महर्द्धिषु ॥ ५ ॥
प्रोत्फुल्लोत्पलकह्लारकुमुदाम्भोजरेणुभि: ।
वासितामलतोयेषु कूजद्द्विजकुलेषु च ॥ ६ ॥
विजहार विगाह्याम्भो ह्रदिनीषु महोदय: ।
कुचकुङ्कुमलिप्ताङ्ग: परिरब्धश्च योषिताम् ॥ ७ ॥
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: भाग्य की देवी के स्वामी भगवान सुखपूर्वक अपनी राजधानी द्वारका पुरी में रह रहे थे, जो सभी धन-दौलत से संपन्न थी और विख्यात वृष्णियों और उनकी आकर्षक वस्त्र धारण करने वाली पत्नियों से आबाद थी। जब ये यौवन की चरमसीमा पर पहुँची ये सुंदर स्त्रियाँ गेंद और अन्य खिलौनों के साथ शहर की छतों पर खेलती थीं तो वो चमकती हुई बिजली की तरह दिखती थीं। शहर की मुख्य सड़कें हमेशा पागल हाथियों से भरी रहती थीं, जो मस्ती में मद निकाल रहे होते थे, और साथ ही अश्वारोही, अलंकृत पैदल सैनिक और चमकदार सोने से सजे रथों पर सवार सैनिकों से भी भरी रहती थीं। शहर में फूलों वाले पेड़ों की पंक्तियों वाले कई उद्यान और पार्क थे, जहाँ मधुमक्खियाँ और पक्षी इकट्ठा होते थे और अपने गीतों से सभी दिशाओं को भर देते थे। भगवान श्रीकृष्ण अपनी सोलह हजार पत्नियों के एकमात्र प्रेमी थे। उन्होंने अलग-अलग रूपों में अपना विस्तार करते हुए प्रत्येक रानी के साथ उनके भव्य महलों में आनंद लिया। इन महलों के आँगन में स्वच्छ तालाब थे, जो खिले हुए उत्पल, कह्लार, कुमुद और अम्भोज कमलों के पराग-कणों से सुगंधित थे और चहचहाते हुए पक्षियों के झुंडों से भरे थे। सर्वशक्तिमान प्रभु इन तालाबों और विभिन्न नदियों में प्रवेश करके जलक्रीड़ा का आनंद लेते थे और उनकी पत्नियाँ उन्हें गले लगाती थीं, जिससे उनके स्तनों पर लगे लाल कुमकुम उनके शरीर पर लग जाते थे।
Sukadeva Gosvami said: The Lord, the husband of Lakṣmī, lived happily in His capital, Dvārakā-puri, which was adorned with all opulences and populated by illustrious Vṛṣṇīs and their wives, decked in elaborate costumes. When these youthful and beautiful women played ball and other toys on the rooftops of the city, they sparkled like flashes of lightning. The main streets of the city were crowded with mad elephants in their ecstasy and well-dressed horsemen, well-dressed foot soldiers, and soldiers in gleaming chariots decked with gold. The city had numerous gardens and orchards with rows of flowering trees, where the bumble bees and birds gathered and filled all directions with their songs. Lord Kṛṣṇa was the only beloved of His sixteen thousand wives. Expanding Himself into as many forms as He did, He enjoyed with each queen in her richly furnished residences. In the courtyards of these palaces were pristine ponds, fragrant with the pollen of blooming utpala, kahlar, kumudha and ambhosa lotuses and filled with flocks of chirping birds. The Almighty Lord would enter these ponds and various rivers and enjoy water sports while His wives would embrace Him, causing the red kumkum smeared on their breasts to smear on His body.
तात्पर्य
प्रभु कृष्ण अपनी सोलह हजार पत्नियों से ख़ास तौर पर प्यार करते थे। वो अपने आप को उतने ही रूपों में विस्तारित करके अपनी हर रानी के साथ उनके अपने अमीरी सजावट वाले महलों में आनंद लेते थे। इन महलों के मैदानों में साफ़ तालाब थे जो खिले हुए उत्पल, कलहारा, कमुदा और अंबोहा कमलों के पराग से सुगंधित थे और उनमें चिड़ियों का झुंड रहता था। सर्वशक्तिमान प्रभु उन तालाबों और अन्य नदियों में जाते थे और पानी में मस्ती करते हुए आनंद लेते थे जबकि उनकी पत्नियाँ उन्हें गले लगाती थीं, और उनके स्तनों पर लगी लाल कुंकुमा उनके शरीर पर लगा रहता था। वैष्णव लेखकों द्वारा लिखे जाने वाले काव्यात्मक लेखन का एक नियम होता यह होता है: "मधुरेण समापयेत: "एक साहित्यिक कृति को विशेष मिठास के भाव में ख़त्म होना चाहिए। श्रीमद भागवतम के दसवें खंड के अंतिम अध्याय में आध्यात्मिक विषयों के सबसे बेहतरीन वर्णनकर्ता श्रील शुकादेव गोस्वामी ने, तदनुसार, आकर्षक द्वारका में भगवान कृष्ण के पानी में खेलने का वर्णन अपने लेख में शामिल किया है, इसके बाद प्रभु की रानियों की तारीफ़ में की गई प्रार्थनाएँ शामिल की हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥