ये यथा माम प्रपद्यन्ते
तांस्तथाइव भजाम्य अहम्
मम वर्तमानुवर्तन्ते
मनुष्याः पार्थ सर्वशः
"जैसे जीवित इकाइयाँ मेरी शरण लेती हैं, मैं उसी तरह उन्हें पुरस्कार देता हूँ। हर कोई हर तरह से मेरे मार्ग का अनुसरण करता है, हे पृथा के बेटे।" हर कोई कृष्ण को पाना चाहता है, क्योंकि वह सभी अलग-अलग आत्माओं के महात्मा (आत्मा) हैं। हर कोई अपने शरीर से प्रेम करता है और उसे बचाना चाहता है क्योंकि वह शरीर में आत्मा के रूप में रहता है और हर कोई आत्मा से प्रेम करता है क्योंकि आत्मा महात्मा का हिस्सा है। इसलिये, हर कोई महात्मा के साथ अपने संबंध को जीवंत करके खुशी प्राप्त करना चाहता है। जैसा कि भगवान भगवत गीता (15.15) में कहते हैं, वेदैंश्च सर्वैर अहम् एव वेध्य: : "सभी वेदों के द्वारा, मैं वही हूँ जिसे जाना जाना है।" इसलिये कर्मियों, ज्ञानियों, योगियों और संत जन सभी कृष्ण को पाने की कोशिश करते हैं। लेकिन भक्तों के पदचिह्नों का अनुसरण करके जो कि कृष्ण से सीधे संबंध में हैं, खास तौर पर वृंदावन के निवासी, कोई कृष्ण के साथ जुड़ने की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। जैसा कि कहा गया है, वृंदावनं परित्यज्य पदम एकं न गच्छति: कृष्ण वृंदावन को एक पल के लिये भी नहीं छोड़ते। वृंदावन वासी - माँ यशोदा, कृष्ण के दोस्त और कृष्ण के जीवन साथी प्रेमी, कम उम्र की गोपी जिनके साथ वह नाचते हैं - का कृष्ण के साथ बहुत आत्मीय रिश्ता है, और अगर कोई भी इन भक्तों के पदचिह्नों पर चलता है, कृष्ण मिल जाते हैं। हालाँकि कृष्ण के नित्य-सिद्ध विस्तार हमेशा कृष्ण के साथ रहते हैं, अगर साधना-सिद्धि में लगे हुए लोग कृष्ण के नित्य-सिद्ध सहयोगियों के पदचिह्नों पर चलते हैं, ऐसे साधना-सिद्ध भी बिना किसी कठिनाई के कृष्ण को आसानी से पा सकते हैं। लेकिन कुछ ऐसे लोग हैं जो शरीर के साथ जीवन की अवधारणा से जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव का बहुत प्रतिष्ठित पद है, और इसलिये उनमें बहुत उच्च श्रेणी के ईश्वर होने का भाव है। दूसरे शब्दों में, क्योंकि भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव गुणावतार हैं और बहुत उच्च पद पर हैं, उनके पास कृष्ण की तरह होने की थोड़ी-बहुत भावना है। लेकिन शुद्ध भक्त जो वृंदावन में रहते हैं, उनके पास कोई भी शारीरिक अवधारणा नहीं होती। वे भगवान की सेवा को पूरी तरह से पवित्र स्नेह, प्रेम में समर्पित करते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसलिये सिफारिश की है, प्रेमा पुम-अर्थो महान: जीवन की सबसे ऊँची सिद्धि प्रेम है, कृष्ण के साथ रिश्ते में शुद्ध प्रेम। और माँ यशोदा उन उत्तम भक्तों में से एक हैं, जो इस सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।
