श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 9: माता यशोदा द्वारा कृष्ण का बाँधा जाना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  10.9.13-14 
न चान्तर्न बहिर्यस्य न पूर्वं नापि चापरम् ।
पूर्वापरं बहिश्चान्तर्जगतो यो जगच्च य: ॥ १३ ॥
तं मत्वात्मजमव्यक्तं मर्त्यलिङ्गमधोक्षजम् ।
गोपिकोलूखले दाम्ना बबन्ध प्राकृतं यथा ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान का न आदि है, न अंत है, न बाहर है, न भीतर है, न आगे है और न पीछे है। दूसरे शब्दों में, वे सर्वव्यापी हैं। चूँकि वे काल तत्व के वशीभूत नहीं हैं, इसलिए उनके लिए भूत, वर्तमान और भविष्य में कोई अंतर नहीं है। वे सदा-सर्वदा अपने दिव्य स्वरूप में रहते हैं। सर्वोच्च और परम होने के कारण सभी वस्तुओं के कारण-कार्य होते हुए भी वे कारण-कार्य के भेदों से मुक्त रहते हैं। वही अव्यक्त पुरुष, जो इंद्रियों से परे हैं, अब मानवीय बालक के रूप में प्रकट हुए थे और माता यशोदा ने उन्हें सामान्य सा अपना ही बालक समझकर रस्सी से ओखली से बाँध दिया था।
 
The Supreme Personality of Godhead has no beginning, no end, no outside, no inside, no front and no back. In other words, He is omnipresent. Since He is not subject to the time element, there is no difference for Him between past, present and future. He always remains in His divine form. Being supreme and supreme, He is free from the difference between cause and effect even though all things have cause and effect. The same unmanifested person, who is beyond the senses, had now appeared in the form of a human child and mother Yashoda, thinking Him to be her own child, tied Him to the mortar with a rope.
तात्पर्य
भगवद-गीता (10.12) में कृष्ण को परम ब्रह्म (परं ब्रह्म परं धाम) के रूप में वर्णित किया गया है। ब्रह्म शब्द का अर्थ है "सबसे बड़ा"। कृष्ण सबसे महान से भी महान हैं, असीमित और सर्वव्यापी हैं। सर्वव्यापी को मापा या बाध्य कैसे किया जा सकता है? फिर भी, कृष्ण समय कारक हैं। इसलिए, वह न केवल अंतरिक्ष में बल्कि समय में भी सर्वव्यापी हैं। हमारे पास समय के माप हैं, लेकिन यद्यपि हम भूत, वर्तमान और भविष्य से सीमित हैं, कृष्ण के लिए ये मौजूद नहीं हैं। प्रत्येक व्यक्ति को मापा जा सकता है, लेकिन कृष्ण पहले ही दिखा चुके हैं कि यद्यपि वह भी एक व्यक्ति हैं, संपूर्ण ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति उनके मुंह के भीतर है। इन सभी बिंदुओं पर विचार करने पर, कृष्ण को मापा नहीं जा सकता। तो फिर यशोदा उनका माप और बंधन कैसे करना चाहती थीं? हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि यह केवल विशुद्ध आध्यात्मिक प्रेम के मंच पर हुआ था। यही एकमात्र कारण था।

अद्वैतं अच्युतं अनादि अनन्त-रूपम्

आद्यं पुराण-पुरुषं नव-यौवनं च

वेदेषु दुर्लभम् अदुर्लभम् आत्म-भक्तौ

गोविन्दम् आदि-पुरुषं तम अहं भजामि

(ब्रह्म-संहिता 5.33)

सब कुछ एक है क्योंकि कृष्ण हर चीज के परम कारण हैं। कृष्ण को वैदिक ज्ञान (वेदेषु दुर्लभम्) द्वारा मापा या परिकलित नहीं किया जा सकता है। वह केवल भक्तों के लिए उपलब्ध हैं (आत्म-भक्तौ अदुर्लभम्)। भक्त उनसे निपट सकते हैं क्योंकि वे प्रेममयी सेवा (भक्त्या माम अभिजानाति यावान यश्चासमि तत्त्वतः) के आधार पर कार्य करते हैं। इस प्रकार माता यशोदा उन्हें बाँधना चाहती थीं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)