भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं ही इस अथाह रूप में अपनी पूजा की और अर्जुन भी भगवान महाविष्णु के दर्शन से चकित होकर उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात, जब वे दोनों हाथ जोड़े उनके सामने खड़े थे, तब ब्रह्माण्ड के समस्त शासकों के परम स्वामी महाविष्णु मुस्कुराए और अत्यंत गंभीर वाणी में उनसे बोले।
Lord Krishna worshipped Himself in this infinite form and Arjuna, astonished at the sight of Mahavishnu, bowed before Him. Thereafter, when both of them stood before Him with folded hands, Mahavishnu, the supreme lord of all the caretakers of the universe, smiled and spoke to them in a very serious voice.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती इस श्लोक पर निम्नलिखित अवलोकन करते हैं : जिस प्रकार भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की पूजा के दौरान अपने विग्रह को प्रणाम किया, ठीक उसी तरह अब भी उन्होंने अपने लीलाओं को निभाने के उद्देश्य से अपने विष्णु विस्तार को नमन किया। प्रभु अनंत हैं, अनगिनत अभिव्यक्तियों से युक्त हैं, और यह आठ-भुजाओं वाला रूप उनमें से एक है। वे अच्युत हैं, "अपने पद से कभी न गिरने वाले", इस अर्थ में कि वे वृंदावन के एक ग्वाले के रूप में अपनी मानवीय-समान लीलाओं में संलग्न होना कभी बंद नहीं करते हैं। इस प्रकार कृष्ण के रूप में अपनी मानवीय-समान लीलाओं की विशेष पवित्रता की रक्षा करने के लिए, उन्होंने अपने पूर्ण विस्तार को प्रणाम किया। भगवान महा-विष्णु कृष्ण और अर्जुन के सामने प्रभु के रूप में प्रकट हुए, जो सर्वोच्च संपन्न हैं, और बहु ब्रह्माओं के प्रभु के रूप में, जो लाखों ब्रह्मांडों पर शासन करते हैं। उन्होंने श्री कृष्ण के इरादे के अनुसार, अर्जुन को विचलित करने के लिए इस तरह से बोला। उनकी मुस्कान उनके निजी विचारों पर संकेत देती थी, जिसे श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने हमारे लाभ के लिए प्रकट किया है: "मेरे प्रिय कृष्ण, आपकी इच्छा से मैं अपनी श्रेष्ठता का वर्णन करूंगा, भले ही मैं आपका विस्तार हूं। साथ ही, हालाँकि, मैं अपने कथनों में आपके सौंदर्य, चरित्र और शक्ति की सर्वोच्च स्थिति और इस तथ्य को कि आप वह स्रोत हैं जिससे मैं निकलता हूं, को सूक्ष्म ढंग से निहित करूंगा। बस देखिए कि मैं कितना चतुर हूं - कि अर्जुन के सामने मैं गुप्त रूप से अपनी सच्ची पहचान आपसे भिन्न नहीं बता रहा हूं।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥