श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 89: कृष्ण तथा अर्जुन द्वारा ब्राह्मण-पुत्रों का  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  10.89.51 
द्वारेण चक्रानुपथेन तत्तम:
परं परं ज्योतिरनन्तपारम् ।
समश्न‍ुवानं प्रसमीक्ष्य फाल्गुन:
प्रताडिताक्षो पिदधेऽक्षिणी उभे ॥ ५१ ॥
 
 
अनुवाद
सुदर्शन चक्र के पीछे-पीछे रथ अंधकार को लाँघकर सर्वव्यापी ब्रह्मज्योति के विराट आध्यात्मिक प्रकाश में जा पहुँचा। जैसे ही अर्जुन ने इस चमकती हुई प्रभा को देखा, उसकी आँखों को पीड़ा होने लगी, अत: उसने उन्हें बंद कर लिया।
 
Following the Sudarshana Chakra, the chariot crossed the darkness and entered the infinite spiritual light of the all-pervading Brahmajyoti. As soon as Arjuna saw this blazing light, his eyes began to hurt, so he closed them.
तात्पर्य

ब्रह्माण्ड के आठ संकेंद्रित खोलों में से प्रत्येक से निकलते हुए, सुदर्शन चक्र ने भगवान कृष्ण के रथ को आध्यात्मिक आकाश के असीम, आत्म-चमकदार वातावरण में पहुँचाया। भगवान कृष्ण और अर्जुन की वैकुण्ठ की इस यात्रा का वर्णन श्री हरिवंश में भी मिलता है, जहाँ भगवान को अपने साथी से यह कहते हुए उद्धृत किया गया है:

ब्रह्म-तेजो-मयं दिव्यं

महद् यद् दृष्टवान् असि

अहं स भरत-श्रेष्ठ

मद्-तेजः तत् सनातनम्

"ब्रह्म तेज का जो दिव्य विस्तार आपने देखा है, वह मेरे सिवाय और कोई नहीं है, हे भारत श्रेष्ठ। यह मेरा अपना शाश्वत तेज है।"

प्रकृति सा मम परा

व्यक्ताव्यक्ता सनातनी

तां प्रविश्या भवन्तीह

मुक्ता योग-विद्-उत्तमाः

"इसमें मेरी शाश्वत, आध्यात्मिक ऊर्जा निहित है, जो कि प्रकट और अप्रकट दोनों है। इस लोक के श्रेष्ठ योग विशेषज्ञ इसके भीतर प्रवेश करते हैं और मुक्त हो जाते हैं।"

सा साङ्ख्यानां गति पार्थ

योगिनाम च तपस्विनाम

तत् परं परमं ब्रह्म

सर्वं विभजते जगत्

ममैव तद् घनं तेजो

ज्ञातुं अर्हसि भारत

"यह सांख्य के अनुयायियों का परम लक्ष्य है, हे पार्थ, और योगियों और तपस्वियों का भी। यह सर्वोच्च परम सत्य है, जो संपूर्ण सृजित ब्रह्मांड की विविधताओं को प्रकट करता है। आपको इस ब्रह्मज्योति को समझना चाहिए, हे भारत, मेरे केंद्रित व्यक्तिगत तेज के रूप में।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)