श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 89: कृष्ण तथा अर्जुन द्वारा ब्राह्मण-पुत्रों का  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  10.89.25 
एवं द्वितीयं विप्रर्षिस्तृतीयं त्वेवमेव च ।
विसृज्य स नृपद्वारि तां गाथां समगायत ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
उस बुद्धिमान ब्राह्मण को यही दुख अपने दूसरे तथा तीसरे पुत्र के साथ भी भोगना पड़ा। हर बार वह अपने मृत पुत्र का शव राजा के दरवाजे पर रखकर वही विलाप गीत गाता।
 
उस बुद्धिमान ब्राह्मण को यही दुख अपने दूसरे तथा तीसरे पुत्र के साथ भी भोगना पड़ा। हर बार वह अपने मृत पुत्र का शव राजा के दरवाजे पर रखकर वही विलाप गीत गाता।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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