श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 89: कृष्ण तथा अर्जुन द्वारा ब्राह्मण-पुत्रों का  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  10.89.23 
ब्रह्मद्विष: शठधियो लुब्धस्य विषयात्मन: ।
क्षत्रबन्धो: कर्मदोषात् पञ्चत्वं मे गतोऽर्भक: ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
[ब्राह्मण बोला] : ब्राह्मणों का शत्रु यह कपटी तथा लालची शासक इन्द्रियसुख में लिप्त और योग्यताहीन है। अपने कामों में उसने जो गलती की है उसकी वजह से मेरे पुत्र की मृत्यु हो गई।
 
[The Brahmin said]: My son has died because of some mistake committed by this wicked, greedy enemy of the Brahmins and an incapable ruler who is always engrossed in sensual pleasures, in the performance of his duties.
तात्पर्य
यह मानते हुए कि उसने अपने पुत्र की मृत्यु का कारण बनने के लिए कुछ भी नहीं किया था, ब्राह्मण ने राजा उग्रसेन को दोष देना उचित समझा। वैदिक सामाजिक व्यवस्था में, सम्राट को अपने राज्य में होने वाली हर चीज के लिए जिम्मेदार माना जाता है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। लोकतंत्र में भी, कोई प्रबंधक जो किसी समूह या परियोजना का प्रभार लेता है, उसे किसी भी विफलता के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए, न कि जैसा कि आज बहुत आम है, दोष अपने अधीनस्थों या वरिष्ठों पर डालने का प्रयास करना।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)