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श्लोक 10.89.23  |
ब्रह्मद्विष: शठधियो लुब्धस्य विषयात्मन: ।
क्षत्रबन्धो: कर्मदोषात् पञ्चत्वं मे गतोऽर्भक: ॥ २३ ॥ |
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| अनुवाद |
| [ब्राह्मण बोला] : ब्राह्मणों का शत्रु यह कपटी तथा लालची शासक इन्द्रियसुख में लिप्त और योग्यताहीन है। अपने कामों में उसने जो गलती की है उसकी वजह से मेरे पुत्र की मृत्यु हो गई। |
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| [ब्राह्मण बोला] : ब्राह्मणों का शत्रु यह कपटी तथा लालची शासक इन्द्रियसुख में लिप्त और योग्यताहीन है। अपने कामों में उसने जो गलती की है उसकी वजह से मेरे पुत्र की मृत्यु हो गई। |
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