श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 89: कृष्ण तथा अर्जुन द्वारा ब्राह्मण-पुत्रों का  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  10.89.20 
श्रीसूत उवाच
इत्येतन्मुनितनयास्यपद्मगन्ध-
पीयूषं भवभयभित् परस्य पुंस: ।
सुश्लोकं श्रवणपुटै: पिबत्यभीक्ष्णं
पान्थोऽध्वभ्रमणपरिश्रमं जहाति ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
श्री सूत गोस्वामी ने कहा: इस प्रकार से, व्यासदेव मुनि के पुत्र, शुकदेव गोस्वामी के मुख-कमल से सुगन्धित अमृत का प्रवाह हुआ। परमपुरुष की अद्भुत महिमा का यह गायन भौतिक अस्तित्व के समस्त भय को नष्ट करता है। जो यात्री इस अमृत को अपने कानों के माध्यम से लगातार पीता है, वह सांसारिक जीवन के मार्गों पर भटकने से होने वाली थकान को भूल जाता है।
 
Sri Suta Goswami said: Thus fragrant nectar flowed from the lotus mouth of Sukadeva Goswami, son of Vyasadeva Muni. This wonderful glorification of the Supreme Being destroys all fears of the material world. The traveler who continuously drinks this nectar through his ear-holes will forget the fatigue caused by wandering on the paths of worldly life.
तात्पर्य
श्रील शुकदेव गोस्वामी की यह कथा दो तरह से मूल्यवान है: आध्यात्मिक दुर्बलता से पीड़ित लोगों के लिए यह भ्रम के रोग को दूर करने वाला एक कारगर टॉनिक है। और समर्पित वैष्णवों के लिए यह एक स्वादिष्ट और स्फूर्तिदायक पेय पदार्थ है, जो श्री शुक के साक्षात्कार की सुगंध से सुगंधित है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)