श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 89: कृष्ण तथा अर्जुन द्वारा ब्राह्मण-पुत्रों का  »  श्लोक 14-17
 
 
श्लोक  10.89.14-17 
तन्निशम्याथ मुनयो विस्मिता मुक्तसंशया: ।
भूयांसं श्रद्दधुर्विष्णुं यत: शान्तिर्यतोऽभयम् ॥ १४ ॥
धर्म: साक्षाद् यतो ज्ञानं वैराग्यं च तदन्वितम् ।
ऐश्वर्यं चाष्टधा यस्माद् यशश्चात्ममलापहम् ॥ १५ ॥
मुनीनां न्यस्तदण्डानां शान्तानां समचेतसाम् ।
अकिञ्चनानां साधूनां यमाहु: परमां गतिम् ॥ १६ ॥
सत्त्वं यस्य प्रिया मूर्तिर्ब्राह्मणास्त्विष्टदेवता: ।
भजन्त्यनाशिष: शान्ता यं वा निपुणबुद्धय: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
भृगु के विवरण को सुन कर मुनियों के सारे संदेह दूर हो गए और वे विश्वस्त हो गए कि विष्णु परमेश्वर हैं। उनके द्वारा शांति, निर्भयता, धर्म के आवश्यक सिद्धांत, ज्ञान के साथ वैराग्य, आठ योग शक्तियाँ और उनके महिमामंडन से मन के सभी दोष धुल जाते हैं। वह उन शांत और संतुलित स्वभाव वाले निस्वार्थ बुद्धिमान ऋषियों की परम गंतव्य हैं जिन्होंने सभी हिंसा का त्याग कर दिया है। उनका सबसे प्रिय स्वरूप शुद्ध सत्त्वगुण से बना है और ब्राह्मण उनके पूजनीय देवता हैं। तीक्ष्ण बुद्धि वाले व्यक्ति जिन्होंने आध्यात्मिक शांति प्राप्त कर ली है, निस्वार्थ भाव से उनकी पूजा करते हैं।
 
The sages were astonished at hearing Bhrigu's description and all their doubts were dispelled and they became convinced that Vishnu is the greatest god. It is from him that one receives peace, fearlessness, the essential principles of religion, detachment with knowledge, the eight yogic powers and his glory which washes away all the impurities of the mind. He is known to be the ultimate destination of those sages who are calm and composed, selfless and adept, who have renounced all violence. His most beloved form is pure Sattva and the Brahmins are his worshipable deities. Persons of keen intellect, who have attained spiritual peace, worship him selflessly.
तात्पर्य
भगवद-व्यक्तित्व के भक्त बनने से व्यक्ति बिना अलग से प्रयास किए, आसानी से दैवी ज्ञान और इंद्रियों द्वारा भोगने से वैराग्य प्राप्त कर लेता है। जैसा कि श्रीमद् भागवतम् के ग्यारहवें सर्ग (11.2.42) में वर्णित है:

भक्तिः परेशानुभवो विरक्ति-

रन्यत्र चैष त्रिक एक-कालः

प्रपद्यमानस्य यथाशनतः स्यु-

स्तुष्टिः पुष्टिः क्षुदपायानु घासम्

“भक्ति, परमेश्वर का सीधा अनुभव और अन्य वस्तुओं से वैराग्य - ये तीनों एक साथ उस व्यक्ति में प्रकट होते हैं जिसने भगवान की परम शख्सियत का आश्रय लिया है, जैसे प्रसन्नता, पोषण और भूख से राहत, भोजन में लगे व्यक्ति के साथ प्रत्येक निवाले पर एक साथ और लगातार आती है।” इसी तरह, पहले सर्ग में (1.2.7), श्रील सुत गोस्वामी कहते हैं:

वासुदेवे भगवति

भक्ति-योगः प्रयोजितः

जनयत्य आशु वैराग्यं

ज्ञानं च यद अहेतुकम्

“भगवान, श्री कृष्ण के प्रति भक्ति सेवा करने से, व्यक्ति को तुरंत निस्वार्थ ज्ञान और दुनिया से वैराग्य प्राप्त हो जाता है।” भगवान श्री कपिल ने अपनी माँ देवहूति को अपने निर्देशों में प्रस्तावित किया है कि योग की आठ गुना शक्तियाँ भी भक्ति सेवा के संयोगात्मक फल हैं:

अथो विभूतिं मम मायाविनस् ताम्

ऐश्वर्यम् अष्टांगम् अनुप्रवृत्तम्

श्रीयं भागवतीं वास्पृहन्ति भद्रां

परस्य मे तेऽश्नुवते हि लोके

“क्योंकि वह मेरे बारे में विचारों में पूरी तरह से लीन है, मेरा भक्त सत्यलोक सहित ऊपरी ग्रह मंडलों में प्राप्त होने वाले उच्चतम आशीर्वाद की भी इच्छा नहीं करता है। वह रहस्यमय योग से प्राप्त आठ भौतिक सिद्धियों की इच्छा नहीं करता है, और न ही वह ईश्वर के राज्य में ऊंचा होना चाहता है। फिर भी उसे चाहे बिना, मेरा भक्त, इस जीवन में भी, सभी प्रदान किए गए आशीर्वादों का आनंद लेता है।" (भाग. 3.25.37)

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती बताते हैं कि पाठ्य 16 में, तीन प्रकार के पारलौकिकवादियों के नाम दिए गए हैं: मुनी, शांत और साधु। ये हैं, बढ़ते हुए महत्व के क्रम में, मुक्ति के लिए प्रयास करने वाले व्यक्ति, जिन्होंने मुक्ति प्राप्त की है, और जो भगवान विष्णु के प्रति शुद्ध भक्ति सेवा में लगे हुए हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)