भक्तिः परेशानुभवो विरक्ति-
रन्यत्र चैष त्रिक एक-कालः
प्रपद्यमानस्य यथाशनतः स्यु-
स्तुष्टिः पुष्टिः क्षुदपायानु घासम्
“भक्ति, परमेश्वर का सीधा अनुभव और अन्य वस्तुओं से वैराग्य - ये तीनों एक साथ उस व्यक्ति में प्रकट होते हैं जिसने भगवान की परम शख्सियत का आश्रय लिया है, जैसे प्रसन्नता, पोषण और भूख से राहत, भोजन में लगे व्यक्ति के साथ प्रत्येक निवाले पर एक साथ और लगातार आती है।” इसी तरह, पहले सर्ग में (1.2.7), श्रील सुत गोस्वामी कहते हैं:
वासुदेवे भगवति
भक्ति-योगः प्रयोजितः
जनयत्य आशु वैराग्यं
ज्ञानं च यद अहेतुकम्
“भगवान, श्री कृष्ण के प्रति भक्ति सेवा करने से, व्यक्ति को तुरंत निस्वार्थ ज्ञान और दुनिया से वैराग्य प्राप्त हो जाता है।” भगवान श्री कपिल ने अपनी माँ देवहूति को अपने निर्देशों में प्रस्तावित किया है कि योग की आठ गुना शक्तियाँ भी भक्ति सेवा के संयोगात्मक फल हैं:
अथो विभूतिं मम मायाविनस् ताम्
ऐश्वर्यम् अष्टांगम् अनुप्रवृत्तम्
श्रीयं भागवतीं वास्पृहन्ति भद्रां
परस्य मे तेऽश्नुवते हि लोके
“क्योंकि वह मेरे बारे में विचारों में पूरी तरह से लीन है, मेरा भक्त सत्यलोक सहित ऊपरी ग्रह मंडलों में प्राप्त होने वाले उच्चतम आशीर्वाद की भी इच्छा नहीं करता है। वह रहस्यमय योग से प्राप्त आठ भौतिक सिद्धियों की इच्छा नहीं करता है, और न ही वह ईश्वर के राज्य में ऊंचा होना चाहता है। फिर भी उसे चाहे बिना, मेरा भक्त, इस जीवन में भी, सभी प्रदान किए गए आशीर्वादों का आनंद लेता है।" (भाग. 3.25.37)
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती बताते हैं कि पाठ्य 16 में, तीन प्रकार के पारलौकिकवादियों के नाम दिए गए हैं: मुनी, शांत और साधु। ये हैं, बढ़ते हुए महत्व के क्रम में, मुक्ति के लिए प्रयास करने वाले व्यक्ति, जिन्होंने मुक्ति प्राप्त की है, और जो भगवान विष्णु के प्रति शुद्ध भक्ति सेवा में लगे हुए हैं।
