श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 89: कृष्ण तथा अर्जुन द्वारा ब्राह्मण-पुत्रों का  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  10.89.12 
श्रीशुक उवाच
एवं ब्रुवाणे वैकुण्ठे भृगुस्तन्मन्द्रया गिरा ।
निर्वृतस्तर्पितस्तूष्णीं भक्त्युत्कण्ठोऽश्रुलोचन: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: भगवान वैकुंठ के द्वारा कहे गये पवित्र शब्दों को सुनकर भृगु जी प्रसन्न एवं सन्तुष्ट हो उठे। भक्तिमय आनंद से अभिभूत होकर वे मौन हो गए और उनकी आंखें आंसुओं से भर आईं।
 
Sukadeva Goswami said: Hearing the profound words spoken by Lord Vaikuntha, Bhrigu became satisfied and pleased. He became speechless with devotional joy and his eyes filled with tears.
तात्पर्य
भृगु भगवान की कोई प्रशंसा के शब्द नहीं कह सके क्योंकि उनकी आवाज़ एक्स्टेसी के अश्रुओं के कारण रुंध गयी थी। श्रील विश्न्वनाथ चक्रवर्ति के अनुसार, साधु को उसके अपमानजनक व्यवहार के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए, किंवह इसमें उनकी भूमिका ईश्वर के पर्सनालिटी ने ही तय की थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)