उस मिथ्या अहंकार से विकार के रूप में सोलह तत्व पैदा हुए हैं। जब शिव का भक्त इन तत्वों में से किसी एक की भी पूजा करता है तो उसे उसी तत्व के संबंधित भोग्य ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
From that false ego, sixteen elements have emerged in the form of defects. When a Shiva devotee worships any of these defects, he receives all kinds of enjoyable wealth corresponding to that element.
तात्पर्य
मिथ्या अहंकार मन, दस इंद्रिय (आँखें, कान, नाक, जीभ, त्वचा, हाथ, पैर, आवाज़, जननांग और गुदा) और पाँच भौतिक तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) में परिणत हो जाता है। भगवान शिव इन सोलह पदार्थों में से हर एक में विशेष लिंग रूप में प्रकट होते हैं, जिनकी ब्रम्हांड के कई पवित्र स्थानों में विभिन्न देवताओं के रूप में पूजा की जाती है। शिव के भक्त अपने किसी खास लिंग की पूजा उससे संबंधित रहस्यमय संपदा को प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं। इस प्रकार भगवान शिव का आकाश-लिंग आकाश की संपदा, उनका ज्योतिर्-लिंग अग्नि की संपदा और इसी तरह देती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥