श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 88: वृकासुर से शिवजी की रक्षा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  10.88.2 
एतद् वेदितुमिच्छाम: सन्देहोऽत्र महान् हि न: ।
विरुद्धशीलयो: प्रभ्वोर्विरुद्धा भजतां गति: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
हम इस विषय को ठीक से समझने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि यह हमें बहुत परेशान कर रहा है। दरअसल, इन विपरीत चरित्रों वाले प्रभुओं की पूजा करने वालों को जो परिणाम मिल रहे हैं, वो अपेक्षा के विपरीत हैं।
 
हम इस विषय को ठीक से समझने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि यह हमें बहुत परेशान कर रहा है। दरअसल, इन विपरीत चरित्रों वाले प्रभुओं की पूजा करने वालों को जो परिणाम मिल रहे हैं, वो अपेक्षा के विपरीत हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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