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bhagavat 10.88.18-19: केदारनाथ के पवित्र जल में अपने बालों को भिगोने और उन्हें गीला रखने के बाद, सातवें दिन वृकासुर निराश हो गया और भगवान का दर्शन न पाकर कुल्हाड़ी उठाकर अपना सिर काटने लगा। लेकिन उसी क्षण, दयालु भगवान शिव यज्ञ-अग्नि से प्रकट हुए, जो अग्नि देव के समान दिख रहे थे। उन्होंने असुर को आत्महत्या करने से रोकने के लिए उसकी दोनों बाँहें पकड़ लीं, जैसे हम ऐसी परिस्थिति में करते हैं और वृकासुर को एक बार फिर पूर्ण बना दिया।   |   bhagavat अध्याय 10.88: वृकासुर से शिवजी की रक्षा   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 88: वृकासुर से शिवजी की रक्षा  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  10.88.18-19 
देवोपलब्धिमप्राप्य निर्वेदात् सप्तमेऽहनि ।
शिरोऽवृश्चत् सुधितिना तत्तीर्थक्लिन्नमूर्धजम् ॥ १८ ॥
तदा महाकारुणिको स धूर्जटि-
र्यथा वयं चाग्निरिवोत्थितोऽनलात् ।
निगृह्य दोर्भ्यां भुजयोर्न्यवारयत्
तत्स्पर्शनाद् भूय उपस्कृताकृति: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
केदारनाथ के पवित्र जल में अपने बालों को भिगोने और उन्हें गीला रखने के बाद, सातवें दिन वृकासुर निराश हो गया और भगवान का दर्शन न पाकर कुल्हाड़ी उठाकर अपना सिर काटने लगा। लेकिन उसी क्षण, दयालु भगवान शिव यज्ञ-अग्नि से प्रकट हुए, जो अग्नि देव के समान दिख रहे थे। उन्होंने असुर को आत्महत्या करने से रोकने के लिए उसकी दोनों बाँहें पकड़ लीं, जैसे हम ऐसी परिस्थिति में करते हैं और वृकासुर को एक बार फिर पूर्ण बना दिया।
 
Not getting a glimpse of the deity, Vrikasur became despondent. Finally, on the seventh day, soaking his hair in the holy river of Kedarnath and letting it remain wet, he took up an axe and began to chop off his head. But at that very moment the most merciful Lord Shiva appeared from the sacrificial fire, looking like the Agni Deva himself. He held both the arms of the demon to prevent him from committing suicide, as we would do in such a situation. By the touch of Lord Shiva, Vrikasur became whole once again.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)