श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  10.87.42 
श्रीभगवानुवाच
इत्येतद् ब्रह्मण: पुत्रा आश्रुत्यात्मानुशासनम् ।
सनन्दनमथानर्चु: सिद्धा ज्ञात्वात्मनो गतिम् ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री नारायण ऋषि बोले: परमात्मा के बारे में ये उपदेश सुनकर ब्रह्मा के पुत्रों को अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य समझ में आ गया। वे पूरी तरह संतुष्ट हो गये और उन्होंने सनंदन की पूजा करके उनका सम्मान किया।
 
Lord Sri Narayana Rishi said: After hearing this command about the Supreme Being, the sons of Brahma understood their ultimate destination. They were completely satisfied and they worshipped Sanandana and paid their respects to him.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी बताते हैं कि आत्मनूशासनम् की दो प्रकार से समझ हो सकती है, एक तो जीव आत्मा को लाभ पहुंचाने के लिए दिया गया निदेश और दूसरी, जीव एंटिटी के सभी अस्तित्व की नींव के साथ संबंध के बारे में निदेश। इसी तरह आत्मनो गтим का अर्थ है जीव आत्मा की मंजिल और सर्वोच्च आत्मा तक पहुंचने के साधन। इस अध्याय की शुरुआत में बोले गए ब्रह्मोपनिषद की व्याख्या वाले व्यक्तित्व रूपी वेदों की अट्ठाईस प्रार्थनाओं को सुनकर ब्रह्मलोक में एकत्रित हुए ऋषियों ने ईश्वर के प्रति पवित्र प्रेम के अपने लक्ष्य की दिशा में बहुत प्रगति की।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)