न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधना-
दनुमितमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे ।
अत उपमीयते द्रविणजातिविकल्पपथै-
र्वितथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधा: ॥ ३७ ॥
अनुवाद
चूँकि यह ब्रह्माण्ड अपनी रचना से पहले नहीं था और अपने विनाश के बाद नहीं रहेगा, अतः हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि मध्यकाल में यह आपके भीतर कल्पित रूप से दृश्य होता है, जिसका आध्यात्मिक आनन्द कभी नहीं बदलता। हम इस ब्रह्माण्ड की तुलना विविध पदार्थो के रूपांतरण से करते हैं। निश्चित रूप से, जो लोग मानते हैं कि यह कल्पना सत्य है, वे कम बुद्धिमान हैं।
Since this universe did not exist before its creation and will not exist after its destruction, we conclude that in the medium term it is visualized within you, whose spiritual bliss never changes. We compare this universe to the changes of various physical objects. Certainly, those who believe that this little imagination is true are ignorant.
तात्पर्य
इस प्रकार कर्मकांडियों के वेदांत को यथार्थ मान्य करने के सारे प्रयासों को असफल करने के बाद साक्षात् वेद सत्य के विपरीत प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि यह संसार अनित्य होने के कारण असत्य है। सृष्टि के प्रागट्य से पूर्व तथा विलय के बाद केवल भगवान् की ही आत्मिक सत्ता तथा उनकी लीला और परिचारक ही विद्यमान रहते हैं। श्रुतियों इसका समर्थन करती हैं: आत्मा वा इदं एक एवाग्र आसीत्। ''इस संसार की रचना के पूर्व केवल आत्मा ही थी।'' (ऐतरेय उपनिषद १.१) नासद आसी नो सदासीत तदानीम्: ''उस समय न तो अणु न स्थूल पदार्थ ही था।'' (ऋग्वेद १०.१२९.१) एक उदाहरण प्रस्तुत करके सृष्टि की सापेक्षता को समझा जा सकता है। जब मिट्टी और धातु के जैसे मूल पदार्थों का संशोधन और आकार देकर विभिन्न उत्पाद निर्मित किये जाते हैं तो निर्मित वस्तुएँ मिट्टी और धातु से नाम और रूप में भिन्न होकर ही हैं। आधारभूत तत्व अपरिवर्तित रहता है। इसी प्रकार जब भगवान की उर्जाएँ इस संसार की परिचित चीजों में रूपांतरित होती हैं तो वे चीजें भगवान से नाम और रूप में भिन्न होकर ही हैं। छांडोग्य उपनिषद (६.१.४-६) में उद्दालक ऋषि अपने पुत्र को कुछ ऐसा ही उदाहरण समझाते हैं: यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्व मृन्मय विज्ञातं स्याद् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेति एव सत्यम्। ''हे मेरे प्यारे पुत्र! उदाहरण के लिए मिट्टी के एक पिंड से सभी मृण्मय वस्तुओं के स्वरूप को समझ लेना चाहिए। रूपांतरित वस्तुओं का अस्तित्व मात्र भाषा का निर्माण है, उन्हें नाम देने मात्र की बात है। मिट्टी ही सत्य है।'' अंत में, संसार की वस्तुएँ नित्य या तत्व रूप से सत्य हैं, इसका कोई भी समुचित प्रमाण नहीं है। जबकि अत्यधिक प्रमाण इसी के हैं कि वे अनित्य हैं और असत्य नामों से परिभाषित हैं। इसलिए केवल अज्ञानी ही पदार्थों की काल्पनिक लीलाओं को ही यथार्थ समझते हैं। श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं: मुकुट-कुण्डल-कंकण- किंकिणी- परिणतं कनकं परमार्थतः। महाद-अहंकृति खप्रमुखं तथा नरहरर् न परं परमार्थतः। ''मुकुट, कुंडल, कंकण और नूपूर आदि सोने का रूपांतरण हैं, आखिर में वे सोने से अलग नहीं हैं। इसी प्रकार महात, मिथ्याहंकार और आकाश प्रमुख भौतिक तत्व भी नाराहरि भगवान से अलग नहीं हैं।''
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥