नाहं प्रकाशः सर्वस्य
योगमायासमावृतः
मूढोऽयं नाभिजानाति
लोको मामजमव्ययम्
"मैं कभी भी मूर्ख और अज्ञानी के लिए प्रकट नहीं होता हूँ। मेरे लिए वे मेरी आंतरिक शक्ति से ढके होते हैं, और इसलिए वे नहीं जानते कि मैं जन्महीन और अचूक हूँ।" और भगवान ब्रह्मा के शब्दों में,
पन्थास्तु कोटिशतवत्सरसंपर्गम्य
वायोरथापि मनसो मुनिपुंगवानाम्
सोऽप्यस्ति यत्प्रपदसीमन्यविचिंत्यतत्त्वे
गोविंदमादिपुरुषं तमहं भजामी
"मैं गोविंद, आदिम प्रभु की पूजा करता हूँ, जिनके कमल पैरों के तलवे के शीर्ष तक केवल योगी ही पहुँचते हैं, जो परम तत्व के लिए इच्छुक होते हैं और साँस को नियंत्रित करके प्राणायाम करते हैं; या ज्ञानी, जो लाखों वर्षों तक चलने वाली सांसारिक वस्तुओं के लोप की प्रक्रिया द्वारा अविभाजित ब्रह्म की खोज करते हैं।" (ब्रह्म-संहिता 5.34)
ब्रह्मा, इस ब्रह्मांड में प्रथम जन्मे जीव हैं, सर्वप्रथम ऋषि भी हैं। वह भगवान नारायण से जन्मे हैं, और उनसे ही देवताओं की सेनाएँ प्रकट होती हैं, जिनमें पृथ्वी की गतिविधियों के नियंत्रक और स्वर्ग के शासक दोनों शामिल हैं। ये सभी शक्तिशाली और बुद्धिमान प्राणी भगवान की रचनात्मक ऊर्जा के अपेक्षाकृत हाल के उत्पाद हैं। वेदों के प्रथम वक्ता के रूप में, भगवान ब्रह्मा को उनके उद्देश्य को कम से कम किसी भी अन्य अधिकारी के रूप में भी जानना चाहिए, लेकिन यहाँ तक कि वह भगवान को केवल सीमित सीमा तक ही जानते हैं। जैसा कि श्रीमद्भागवतम् (1.3.35) में कहा गया है, वेद-गुह्यानि हृत्-पतेः: "हृदय का स्वामी स्वयं को वैदिक ध्वनि के गोपनीय गर्त के भीतर छिपाता है।" यदि ब्रह्मा और उनसे जन्मे देवगण भी परम प्रभु को आसानी से नहीं जान सकते हैं, तो फिर मात्र नश्वर प्राणी अपने स्वतंत्र ज्ञान प्राप्ति में सफलता की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?
जब तक यह सृष्टि रहती है, जीवों को ज्ञान की राह पर कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। अपने शरीर, मन और अहंकार से मिलकर बने अपने भौतिक आवरणों के साथ अपनी पहचान बनाने के कारण, वे सभी प्रकार के पूर्वाग्रहों और भ्रांतियों को प्राप्त करते हैं। भले ही उनके पास मार्गदर्शन करने के लिए दिव्य शास्त्र हो और कर्म, ज्ञान और योग के निर्धारित तरीकों को निष्पादित करने का अवसर हो, फिर भी बद्ध आत्माओं में निरपेक्ष के ज्ञान को प्राप्त करने की बहुत कम शक्ति होती है। और जब विनाश का समय आता है, तो वैदिक शास्त्र और उनकी नियमनकारी आज्ञाएँ अप्रकट हो जाती हैं, जिससे निष्क्रिय जीव पूरी तरह से अंधेरे में हो जाते हैं। इसलिए हमें भक्ति के बिना ज्ञान के लिए अपने व्यर्थ प्रयासों को त्याग देना चाहिए और केवल परम प्रभु की दया के प्रति समर्पण करना चाहिए, भगवान ब्रह्मा की सलाह पर ध्यान देना चाहिए:
ज्ञान प्रयासम उदपास्य नमंता एव
जीवंति संमुखरितां भवदीयवातम्
स्थाने स्थितः श्रुतिगतं तनुवांमनोभिः
ये प्रायशोजितजितोऽप्यसि तिस्त्रिलोकाम्
"जो लोग अपनी स्थापित सामाजिक स्थिति में बने रहते हुए भी, सट्टा ज्ञान की प्रक्रिया को त्याग देते हैं और अपने शरीर, शब्दों और मन से आपके व्यक्तित्व और गतिविधियों के वर्णन के प्रति सभी सम्मान प्रकट करते हैं, अपने जीवन को इन वर्णनों के लिए समर्पित करते हैं, जो आपके द्वारा व्यक्तिगत रूप से और आपके द्वारा कंपाया जाता है आपके शुद्ध भक्त, निश्चित रूप से आपके प्रभुत्व पर विजय प्राप्त करते हैं, हालाँकि आप अन्यथा तीनों लोकों में किसी के भी द्वारा अपराजेय हैं।" (भा. 10.14.3)
इस संबंध में, तैत्तिरीय उपनिषद (2.4.1) परमतत्व को यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह, "जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं, और जहाँ मन नहीं पहुँच सकता" के रूप में संदर्भित करता है। ईशोपनिषद (4) में कहा गया है:
अनेजदेकं मनसो जवीयो
नैतद्देवा आप्नुवन पूर्वमर्षत्
तद्धावतोऽन्यान अति एति तिष्ठत्
तस्मिन्नापो मातरिश्वा दधाति
"हालांकि अपने निवास स्थान में स्थिर, ईश्वर की लीला मन से भी तेज है और दौड़ने वालों में सबसे अधिक आगे निकलती है। शक्तिशाली देवता भी उसके पास नहीं जा सकते। यद्यपि एक स्थान पर रहते हुए भी, वह हवा और पानी की आपूर्ति करने वालों को नियंत्रित करता है। वह हर किसी की श्रेष्ठता से परे है। ऋग्वेद (3.54.5) में हम यह मंत्र पाते हैं:
ko ’ddhā veda ka iha pravocat
kuta āyātāḥ kuta iyaṁ visṛṣṭiḥ
arvāg devā visarjanenā-
thā ko veda yata ā babhūva
"इस संसार में वास्तव में कौन जानता है, और कौन समझा सकता है, कि यह सृष्टि कहां से आई है? देवता भी सृष्टि से छोटे हैं। तो फिर कौन बता सकता है कि यह संसार कैसे बना?"
श्रील श्रीधर स्वामी इस प्रकार प्रार्थना करते हैं:
kvāhaṁ buddhy-ādi-saṁruddhaḥ
kva ca bhūman mahas tava
dīna-bandho dayā-sindho
bhaktiṁ me nṛ-hare diśa
"मैं कौन हूं, जो सांसारिक बुद्धि आदि के भौतिक आवरणों में फंसा हुआ हूं? और हे सर्वशक्तिमान, तुम्हारे गौरव की तुलना में मैं क्या हूं? हे पतितों के मित्र, हे दया के सागर, हे भगवान नृहरि, कृपया मुझे अपनी भक्ति सेवा का आशीर्वाद दो।"
