वाग-ईशा यस्य वदने
लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि
यस्यास्ते हृदये संवित
तं नृसिंहमहं भजे
"मैं भगवान नृसिंह की आराधना करता हूँ, जिनके मुख में वाणी के महान गुरु विराजमान हैं, जिनके वक्षस्थल पर वैभव की देवी निवास करती है तथा जिनके हृदय में चेतना की दिव्य शक्ति निवास करती है।"
सम्प्रदाय-विशुद्धि-अर्थं
स्वीय-निर्बन्ध-यंत्रिताः
श्रुति-स्तुति-मिता-व्याख्यां
करिष्यामि यथा-मत्ति
"अपने संप्रदाय को पवित्र करने की इच्छा से तथा कर्त्तव्य से बंधे होने के कारण, मैं व्यक्तिगत वेदों की प्रार्थनाओं पर संक्षेप में टीका करूंगा, अपने सर्वोत्तम बोध के अनुसार।"
श्रीमद्-भागवतम पूर्वैः
सारतः सन्निषेवितम्
मया तु तद-उपस्पृष्टम
उच्छिष्टमुपचीयते
"जहां तक श्रीमद्-भागवतम की बात है, उसे पहले ही मेरे पूर्ववर्तियों के स्पष्टीकरणों द्वारा पूर्ण रूप से सम्मानित किया जा चुका है। मैं केवल उन्हीं द्वारा सम्मानित किए गए अवशेषों को एकत्र कर सकता हूँ।"
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती अपना स्वयं का आह्वान प्रस्तुत करते हैं:
मम रत्न-वणिक-भावं
रत्नान्यपरिचिन्वतः
हसंतु सन्तो जिह्रेमि
न स्व-स्वांत-विनोद-कृत
"पवित्र भक्त मेरा मजाक उड़ा सकते हैं क्योंकि मैं रत्न व्यापारी बन गया हूँ, हालाँकि मुझे कीमती रत्नों के बारे में कुछ भी नहीं पता। लेकिन मुझे कोई शर्म नहीं है, क्योंकि कम से कम मैं उनका मनोरंजन तो कर सकता हूँ।"
न मेऽस्ति वैदुष्य अपि नापि भक्तिः
विरक्ति-रक्तिर्न तथापिलौल्यात्
सु-दुर्गमादेव भवामिवेद-
स्तुत्य-अर्थ-चिंतामणि-राशि-गृध्नुः
"हालांकि मेरे पास न बुद्धि है, न भक्ति और न ही वैराग्य है, लेकिन मैं फिर भी वेदों की प्रार्थनाओं के दार्शनिक पाषाण को उस किले से लेने के लिए लालायित हूँ जिसमें इसे रखा गया है।"
मां नीचतायामविवेक-वायुः
प्रवर्तते पातयितुं बलाच्चेत
लिखाम्यत: स्वामी-सनातन-श्री-
कृष्णांघ्रि-भा-स्तंभ-कृतावलंबः
"अगर अविवेक की हवा - मेरी अपनी नीची स्थिति को स्वीकार करने में मेरी विफलता - मुझे नीचे गिराने की धमकी देती है, तो इस टीका को लिखते समय मुझे श्रीधर स्वामी, सनातन गोस्वामी और भगवान श्री कृष्ण के चरणों के प्रकाशमय स्तंभों का सहारा लेना चाहिए।"
प्रणम्य श्री-गुरुं भूयः
श्री-कृष्णं करुणार्णवं
लोक-नाथं जगच्चक्षुः
श्री-शुकं तमुपाश्रये
"बार-बार अपने दिव्य आध्यात्मिक गुरु और भगवान श्री कृष्ण, दया के सागर को नमन करते हुए, मैं शरण लेता हूँ श्री शुकदेव गोस्वामी की, जो दुनिया के रक्षक और उसकी सार्वभौमिक आँख हैं।"
पिछले अध्याय के अंत में, शुकदेव गोस्वामी ने परीक्षित महाराज से कहा:
एवं स्व-भक्तायो राजन्
भगवान् भक्त-भक्तिमान्
उषित्वादिश्य सन्-मार्गं
पुनर्द्वारवतीमागत
"इस प्रकार, हे राजा, भगवान, जो अपने भक्तों के भक्त हैं, अपने दो महान भक्तों के साथ कुछ समय तक रहे, उन्हें सिखाया कि कैसे परिपूर्ण संत व्यवहार करते हैं। तब वह द्वारका लौट आए।" इस श्लोक में, सं-मार्गम शब्द को कम से कम तीन तरीकों से समझा जा सकता है। पहले में, सत को "परम भगवान का भक्त" माना जाता है, और इस प्रकार सं-मार्गम का अर्थ है "भक्ति-योग का मार्ग, भक्ति सेवा।" दूसरे में, सत का अर्थ "आध्यात्मिक ज्ञान का साधक" होने के साथ, सं-मार्गम का अर्थ है "ज्ञान का दार्शनिक मार्ग," जिसका उद्देश्य अवैयक्तिक ब्रह्म है। और तीसरे में, सत का तर्जुमा वेदों की पारलौकिक ध्वनि के संदर्भ में करने के साथ, सं-मार्गम का अर्थ है "वैदिक आज्ञाओं का पालन करने की प्रक्रिया।" सं-मार्गम की इन दोनों और तीसरी व्याख्या से यह प्रश्न उठता है कि वेद परम सत्य का वर्णन कैसे कर सकते हैं।
श्रील श्रीधर स्वामी संस्कृत काव्यशास्त्र के पारंपरिक अनुशासन के संदर्भ में इस समस्या का विस्तार से विश्लेषण करते हैं: हमें विचार करना चाहिए कि शब्दों में तीन प्रकार की अभिव्यंजक क्षमता होती है, जिन्हें शब्दा-वृत्तियाँ कहते हैं। ये विभिन्न तरीके हैं जिनसे एक शब्द अपने अर्थ को संदर्भित करता है, जिसे मुख्या-वृत्ति, लक्षणा-वृत्ति और गौणा-वृत्ति के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मुख्या नामक शब्दा-वृत्ति किसी शब्द का प्राथमिक, शाब्दिक अर्थ है; इसे अभिधा, किसी शब्द का "अर्थ" या शब्दकोश अर्थ के रूप में भी जाना जाता है। मुख्या-वृत्ति को आगे दो उपश्रेणियों में विभाजित किया गया है, अर्थात् रूढ़ि और योग। एक प्राथमिक अर्थ को रूढ़ि कहा जाता है जब यह पारंपरिक उपयोग पर आधारित होता है, और योग तब कहा जाता है जब यह नियमित व्युत्पत्ति संबंधी नियमों द्वारा किसी दूसरे शब्द के अर्थ से लिया जाता है।
उदाहरण के लिए, शब्द "गो" ("गाय") रूढ़ि का एक उदाहरण है, क्योंकि इसका अपने शाब्दिक अर्थ के साथ संबंध विशुद्ध रूप से पारंपरिक है। दूसरी ओर, शब्द "पाचक" ("रसोइया") का अर्थ योग-वृत्ति है, क्योंकि यह शब्द रूट "पैच" ("खाना बनाना") से एजेंट प्रत्यय "का" के जोड़ से निकला है।
अपनी मुख्य-वृत्ति या प्राथमिक अर्थ के अलावा, एक शब्द का उपयोग द्वितीयक, रूपक अर्थ में भी किया जा सकता है। इस उपयोग को लक्षणा कहा जाता है। नियम यह है कि किसी शब्द को रूपक रूप से नहीं समझा जाना चाहिए यदि उसका मुख्य अर्थ दिए गए संदर्भ में समझ में आता है; केवल तभी जब मुख्य अर्थ किसी शब्द के अर्थ को व्यक्त करने में विफल हो जाता है तो लक्षणा-वृत्ति को उचित रूप से ग्रहण किया जा सकता है। लक्षणा के कार्य को तकनीकी रूप से काव्य-शास्त्रों में एक विस्तारित संदर्भ के रूप में समझाया गया है, जो किसी वस्तु के शाब्दिक अर्थ से संबंधित किसी चीज़ की ओर इशारा करता है। इस प्रकार, वाक्यांश गांगायं घोषः का शाब्दिक अर्थ है "गंगा में ग्वालों का गाँव"। लेकिन वह विचार बेतुका है, इसलिए यहाँ गंगायं को उसके लक्षणा अर्थ "गंगा के तट पर" से समझा जाना चाहिए, तट नदी से संबंधित कुछ है। गौण-वृत्ति लक्षणा का एक विशेष प्रकार है, जहाँ अर्थ समानता के कुछ विचार तक विस्तारित होता है। उदाहरण के लिए, कथन में सिम्हो देवदत्तः ("देवदत्त एक शेर है"), वीर देवदत्त को उनके सिंह जैसे गुणों के कारण रूपक रूप से शेर कहा जाता है। इसके विपरीत, सामान्य प्रकार के लक्षणा का उदाहरण, अर्थात् गंगायं घोषः, समानता के नहीं बल्कि स्थान के संबंध को शामिल करता है।
अस्सी-सातवें अध्याय के इस पहले श्लोक में, परीक्षित महाराज संदेह व्यक्त करते हैं कि कैसे वेदों के शब्द किसी भी वैध प्रकार के शब्द-वृत्ति द्वारा परम सत्य का उल्लेख कर सकते हैं। वे पूछते हैं, कथं साक्षात् चरंति: वेद किस प्रकार ब्रह्म का वर्णन रूढ़-मुख्य-वृत्ति, पारंपरिकता पर आधारित शाब्दिक अर्थ से सीधे कर सकते हैं? आखिरकार, परम सत्य अनिर्देश्य है, पदनाम के लिए दुर्गम है। और वेद ब्रह्म का वर्णन कैसे कर सकते हैं गौण-वृत्ति से भी, समान गुणों पर आधारित रूपक?
वेद गुण-वृत्तयः हैं, गुणात्मक वर्णनों से पूर्ण हैं, लेकिन ब्रह्म निर्गुण है, गुणों के बिना। जाहिर है, समान गुणों पर आधारित एक रूपक उस चीज़ के मामले में लागू नहीं हो सकता जिसके कोई गुण नहीं हैं। इसके अलावा, परीक्षित महाराज बताते हैं कि ब्रह्म सद्-असतः परम है, सभी कारणों और प्रभावों से परे है। किसी भी प्रकट अस्तित्व, सूक्ष्म या स्थूल के साथ कोई संबंध नहीं होने के कारण, परम सत्य को योग-वृत्ति, व्युत्पन्न रूप से व्युत्पन्न अर्थ, या लक्षणा, रूपक द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता है, क्योंकि दोनों को अन्य संस्थाओं के लिए ब्रह्म के कुछ संबंध की आवश्यकता होती है।
इस प्रकार राजा परीक्षित हैरान हैं कि कैसे वेदों के शब्द सीधे परम सत्य का वर्णन कर सकते हैं।
