एवं स्वभक्तयो राजन् भगवान् भक्तभक्तिमान् ।
उषित्वादिश्य सन्मार्गं पुनर्द्वारवतीमगात् ॥ ५९ ॥
अनुवाद
हे राजन, इस तरह से भगवान, जो अपने भक्तों के लिए समर्पित हैं, अपने दो महान भक्तों, श्रुतदेव और बहुलश्रवा के साथ कुछ समय तक रहे, उन्हें पूर्ण संतों के आचरण की शिक्षा देते हुए। तब भगवान द्वारका लौट गए।
O King, the Lord thus attached to His devotees remained there for some time with His two great devotees, Shrutadeva and Bahulasva, teaching them the conduct of perfect saints. Then the Lord returned to Dvaraka.
तात्पर्य
इस कृष्ण लीला के कथन में, सर्वोच्च ईश्वर कृष्ण, उनके दिव्य कृपा ए.सी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने निष्कर्ष निकाला: "इस घटना से हमें यह शिक्षा मिलती है कि राजा बहुलाश्व और ब्राह्मण श्रुतदेव दोनों समान रूप से प्रभु द्वारा स्वीकार किए गए क्योंकि दोनों ही शुद्ध भक्त थे। यह सर्वोच्च ईश्वर द्वारा मान्यता प्राप्त होने के लिए वास्तविक योग्यता है। क्योंकि इस युग की प्रवृत्ति क्षत्रिय या ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने पर झूठा गर्व करना बन गया है, हम बिना किसी योग्यता वाले लोगों को ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य होने का दावा करते देखते हैं। पर जैसा कि धर्मग्रंथों में कहा गया है, कलौ शूद्र-सम्भव: 'इस कलियुग में, हर कोई शूद्र ही जन्मता है।' इसका कारण यह है कि संस्कार के रूप में जानी जाने वाली शुद्धिकरण प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है, जो माता के गर्भावस्था के समय से शुरू होता है और व्यक्ति की मृत्यु तक जारी रहता है। कोई भी व्यक्ति किसी विशेष जाति - विशेषकर उच्च जाति - जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य के सदस्य के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है, केवल जन्म के अधिकार से। यदि किसी को बीजदान संस्कार या गर्भाधान-संस्कार की प्रक्रिया द्वारा शुद्ध नहीं किया जाता है, तो उसे तुरंत शूद्रों में वर्गीकृत किया जाता है क्योंकि केवल शूद्र ही इस शुद्धिकरण प्रक्रिया में नहीं होते हैं। कृष्ण चेतना की शुद्धिकरण प्रक्रिया के बिना यौन जीवन केवल शूद्रों या जानवरों का बीजदान प्रक्रिया है। पर कृष्ण चेतना सर्वोच्च पूर्णता है, जिसके द्वारा हर कोई वैष्णव के स्तर पर आ सकता है। इसमें ब्राह्मण के सभी गुण शामिल हैं। वैष्णवों को चार प्रकार की पापपूर्ण गतिविधियों - अवैध यौन संबंध, नशीले पदार्थों का सेवन, जुआ और पशु खाद्य पदार्थ खाने से मुक्त होना सिखाया जाता है। इन प्रारंभिक योग्यताओं के बिना कोई भी ब्राह्मणिक स्तर पर नहीं हो सकता है, और एक योग्य ब्राह्मण बने बिना, कोई भी शुद्ध भक्त नहीं बन सकता है।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत छियासी अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥