श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 86: अर्जुन द्वारा सुभद्रा-हरण तथा कृष्ण द्वारा अपने भक्तों को आशीर्वाद दिया जाना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  10.86.52 
देवा: क्षेत्राणि तीर्थानि दर्शनस्पर्शनार्चनै: ।
शनै: पुनन्ति कालेन तदप्यर्हत्तमेक्षया ॥ ५२ ॥
 
 
अनुवाद
मंदिरों में स्थित देवताओं, तीर्थस्थलों और पवित्र नदियों को देखकर, छूकर और उनका पूजन करके व्यक्ति धीरे-धीरे शुद्ध हो सकता है। लेकिन महान ऋषियों की कृपादृष्टि प्राप्त करके तुरंत वही फल प्राप्त किया जा सकता है।
 
A man can gradually become pure by seeing, touching and worshipping the idols in temples, places of pilgrimage and holy rivers. But by merely receiving the blessings of great sages, he can immediately attain the same result.
तात्पर्य
एकांतवास में रहने और अपनी पूर्णता पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उच्चतम कोटि के वैष्णव ब्राह्मण अपना जीवन भगवान की भक्ति सेवा का आशीर्वाद साझा करने के लिए समर्पित करते हैं। राजा प्राचीनबरि के पुत्रों के शब्दों में:

तेषाम् विचरताम् पद्भ्यैः

तीर्थनां पावनेच्छया

भीतस्य किं न रोचेता

तावकानां समागमः

"प्रिय भगवान, आपके व्यक्तिगत सहयोगी, आपके भक्त, तीर्थ स्थलों को भी शुद्ध करने के लिए पूरी दुनिया में भ्रमण करते हैं। क्या ऐसा कार्य उन लोगों को खुशी नहीं देता जो वास्तव में भौतिक अस्तित्व से डरते हैं?" (भाग। 4.30.37) और प्रह्लाद महाराज कहते हैं:

प्रायेण देव मुनयः स्व-विमुक्ति-कामा-

मौनं चरन्ति विजने न परार्थ-निष्ठाः

नैतान विहाय कृपणान् विमुक्ष एको

नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनु पश्ये

"मेरे प्रिय भगवान नृसिंहदेव, मैं देखता हूं कि वास्तव में कई संत व्यक्ति हैं, लेकिन वे केवल अपने उद्धार में रुचि रखते हैं। बड़े शहरों और कस्बों की परवाह किए बिना, वे मौन व्रत [मौन-व्रत] के साथ ध्यान करने के लिए हिमालय या जंगल में जाते हैं। उन्हें दूसरों को मुक्त करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। लेकिन मैं, इन सभी गरीब मूर्खों और बदमाशों को छोड़कर, अकेले मुक्त होना नहीं चाहता। मैं जानता हूँ कि कृष्ण चेतना के बिना, आपके चरण कमलों की शरण लिए बिना, कोई भी खुश नहीं हो सकता। इसलिए मैं उन्हें आपके चरण कमलों की शरण में वापस लाना चाहता हूं।" (भाग। 7.9.44)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)