तेषाम् विचरताम् पद्भ्यैः
तीर्थनां पावनेच्छया
भीतस्य किं न रोचेता
तावकानां समागमः
"प्रिय भगवान, आपके व्यक्तिगत सहयोगी, आपके भक्त, तीर्थ स्थलों को भी शुद्ध करने के लिए पूरी दुनिया में भ्रमण करते हैं। क्या ऐसा कार्य उन लोगों को खुशी नहीं देता जो वास्तव में भौतिक अस्तित्व से डरते हैं?" (भाग। 4.30.37) और प्रह्लाद महाराज कहते हैं:
प्रायेण देव मुनयः स्व-विमुक्ति-कामा-
मौनं चरन्ति विजने न परार्थ-निष्ठाः
नैतान विहाय कृपणान् विमुक्ष एको
नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनु पश्ये
"मेरे प्रिय भगवान नृसिंहदेव, मैं देखता हूं कि वास्तव में कई संत व्यक्ति हैं, लेकिन वे केवल अपने उद्धार में रुचि रखते हैं। बड़े शहरों और कस्बों की परवाह किए बिना, वे मौन व्रत [मौन-व्रत] के साथ ध्यान करने के लिए हिमालय या जंगल में जाते हैं। उन्हें दूसरों को मुक्त करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। लेकिन मैं, इन सभी गरीब मूर्खों और बदमाशों को छोड़कर, अकेले मुक्त होना नहीं चाहता। मैं जानता हूँ कि कृष्ण चेतना के बिना, आपके चरण कमलों की शरण लिए बिना, कोई भी खुश नहीं हो सकता। इसलिए मैं उन्हें आपके चरण कमलों की शरण में वापस लाना चाहता हूं।" (भाग। 7.9.44)
