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bhagavat 10.86.42: वह चकित हो गया, सोचने लगा कि गृहस्थ जीवन के अंधे कुएँ में गिरे हुए मुझसे प्रभु कृष्ण से मिलन कैसे संभव हो पाया? और इन महान ब्राह्मणों से मिलने का मौका मुझे कैसे मिल गया, जिनके हृदय में सदैव प्रभु बसते हैं? सचमुच, उनके चरणों की धूल समस्त तीर्थों का आश्रय है।   |   bhagavat अध्याय 10.86: अर्जुन द्वारा सुभद्रा-हरण तथा कृष्ण द्वारा अपने भक्तों को आशीर्वाद दिया जाना   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 86: अर्जुन द्वारा सुभद्रा-हरण तथा कृष्ण द्वारा अपने भक्तों को आशीर्वाद दिया जाना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  10.86.42 
स तर्कयामास कुतो ममान्वभूत्
गृहान्धकूपे पतितस्य सङ्गम: ।
य: सर्वतीर्थास्पदपादरेणुभि:
कृष्णेन चास्यात्मनिकेतभूसुरै: ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
वह चकित हो गया, सोचने लगा कि गृहस्थ जीवन के अंधे कुएँ में गिरे हुए मुझसे प्रभु कृष्ण से मिलन कैसे संभव हो पाया? और इन महान ब्राह्मणों से मिलने का मौका मुझे कैसे मिल गया, जिनके हृदय में सदैव प्रभु बसते हैं? सचमुच, उनके चरणों की धूल समस्त तीर्थों का आश्रय है।
 
He wondered how I, having fallen into the dark well of domestic life, was able to meet Lord Krishna? And how was I allowed to meet these great brahmanas who always carry the Lord in their hearts? Indeed, the dust of their feet is the shelter of all holy places.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)