श्रीबहुलाश्व उवाच
भवान् हि सर्वभूतानामात्मा साक्षी स्वदृग् विभो ।
अथ नस्त्वत्पदाम्भोजं स्मरतां दर्शनं गत: ॥ ३१ ॥
अनुवाद
श्री बहुलाश्व ने कहा: हे सर्वशक्तिमान प्रभु, आप सभी जीवों के आत्मा हैं और उनके स्वयं-प्रकाशित साक्षी हैं। और अब आप हम सभी को, जो लगातार आपके चरणकमलों का ध्यान करते हैं, अपना दर्शन दे रहे हैं।
Sri Bahulasva said: O Almighty Lord, You are the Soul of all beings and their self-illuminated witness and now You are giving Your darshan to all of us who constantly meditate on Your lotus feet.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती बहरूलाश्व के हृदय विचार का इस प्रकार की वर्णन करते हैं: बहरूलाश्व भगवान कृष्ण को सम्पूर्ण अस्तित्व और चेतना के प्रेरक आत्मा के रूप में पूजता है, वह सोचता था कि जैसे उस साधारण अज्ञानी व्यक्ति ने भी भगवान की कृपा से भक्तिमय जागरण प्राप्त किया हो। वह भगवान को सभी शुभ और अशुभ कार्यों के साक्षी के रूप में स्तुति करता है, यह निश्चित रहता है कि भगवान प्रत्येक छोटी-मोटी भक्ति सेवा को याद रखते हैं जो उन्होंने किया है। और वह भगवान को स्वयं ही ज्ञानवान के रूप में स्तुति करता है, जो किसी भी बाहरी स्रोत से ज्ञान या जानकारी प्राप्त करने की कोई आवश्यकता नहीं है, यह ज्ञान कि भगवान हमेशा से बहरूलाश्व की उसे देखने की इच्छा के प्रति जागरूक रहा है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥