श्रीशुक उवाच
अर्जुनस्तीर्थयात्रायां पर्यटन्नवनीं प्रभु: ।
गत: प्रभासमशृणोन्मातुलेयीं स आत्मन: ॥ २ ॥
दुर्योधनाय रामस्तां दास्यतीति न चापरे ।
तल्लिप्सु: स यतिर्भूत्वा त्रिदण्डी द्वारकामगात् ॥ ३ ॥
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: दूरदराज की तीर्थयात्राएं करते हुए, अर्जुन प्रभास पहुंचे। वहां उन्होंने सुना कि बलराम अपने मामा की पुत्री सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते हैं, लेकिन कोई भी उनकी इस योजना का समर्थन नहीं करता। अर्जुन स्वयं सुभद्रा से विवाह करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने त्रिदंड धारण करके एक संन्यासी का वेश बनाया और द्वारका गए।
Sukadeva Goswami said: After traveling far and wide and visiting various holy places, Arjuna came to Prabhasa. There he heard that Balarama wanted to marry his maternal uncle's daughter to Duryodhana and no one supported his plan. Arjuna himself wanted to marry her, so he disguised himself as an ascetic, armed with a tridanda and went to Dwaraka.
तात्पर्य
सुभद्रा को अपनी पत्नी बनाने की अर्जुन की योजना भले ही अपरंपरागत लगी हो, लेकिन वह बिना प्रोत्साहन के काम नहीं कर रहे थे; वास्तव में, भगवान श्रीकृष्ण उनके प्रमुख सह-षड्यंत्रकारी थे। और द्वारका में, अधिकांश राजपरिवार के सदस्य, विशेष रूप से वसुदेव, अपनी लाडली बेटी को दुर्योधन को देने से नाखुश थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥