श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 85: कृष्ण द्वारा वसुदेव को उपदेश दिया जाना तथा देवकी-पुत्रों की वापसी  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  10.85.51 
स्मरोद्गीथ: परिष्वङ्ग: पतङ्ग: क्षुद्रभृद् घृणी ।
षडिमे मत्प्रसादेन पुनर्यास्यन्ति सद्गतिम् ॥ ५१ ॥
 
 
अनुवाद
मेरी कृपा से ये छहों—स्मर, उद्गीथ, परिष्वंग, पतंग, क्षुद्रभृत और घृणी—पवित्र संतों के निवास स्थान पर वापस चले जाएँगे।
 
By my grace, Smar, Udgeetha, Parishvang, Patang, Kshudrabhrit and Ghruni – all these six will go back to the abode of pure saints.
तात्पर्य
ये छह बच्‍चों के नाम हैं जिनका पहला जन्‍म मरीचि के ज्‍येष्‍ठ पुत्र स्‍मर हुए थे। श्रीमद्-भागवतम (10.1.57) में दर्ज है कि पुनः वासुदेव से जन्‍म लेने पर सबसे बड़े स्‍मर को कीर्तिमान कहा गया:

कीर्तिमन्तं प्रथम-जं

कंसयानकदुंदुभिः

अर्पयाम आस कृच्छ्रेण

सोअनृताति-विह्वलः

"कांस को वचन भंग करने के भय से वासुदेव बहुत परेशान थे। इस प्रकार, बहुत कष्‍ट झेलते हुए उन्‍होंने अपने वचन को निभाने के लिए अपने ज्‍येष्‍ठ पुत्र कीर्तिमान को कांस को सौंप दिया।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)