श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 85: कृष्ण द्वारा वसुदेव को उपदेश दिया जाना तथा देवकी-पुत्रों की वापसी  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  10.85.5 
एतन्नानाविधं विश्वमात्मसृष्टमधोक्षज ।
आत्मनानुप्रविश्यात्मन् प्राणो जीवो बिभर्ष्यज ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
हे दिव्य प्रभु, आपने इस संपूर्ण विविध ब्रह्माण्ड को आप ही से निर्मित किया, और फिर आप अपने निजी रूप में परमात्मा के रूप में इसमें प्रवेश किया। इस तरह, हे अजन्मे परम आत्मा, आप सभी की जीवन शक्ति और चेतना के रूप में सृष्टि का पालन-पोषण करते हैं।
 
O Divine Lord, You created this wonderful universe out of Yourself and then You entered it in Your divine form. Thus, O unborn Supreme Being, You are the maintainer of creation in the form of the life and consciousness of each individual.
तात्पर्य
भौतिक ब्रह्माण्ड का निर्माण करते समय, प्रभु स्वयं परमात्मा या पराशक्ति के रूप में विस्तारित होते हैं, और सृष्टि को अपने सार्वभौमिक शरीर के रूप में स्वीकार करते हैं। किसी भी भौतिक शरीर का अस्तित्व का कोई कारण नहीं है यदि उसे भोग के लिए कोई जीव आत्मा न चाहे, और परमात्मा के बिना मार्गदर्शन के लिए उसके साथ आने के बिना कोई जीव स्वतंत्र रूप से शरीर का पालन नहीं कर सकता है। वैष्णव आचार्य, श्रीमद् भागवत के दूसरे कांटो पर अपनी टिप्पणियों में, समझाते हैं कि ब्रह्मा के गर्भोदकशायी विष्णु के कमल नाभि से पैदा होने से पहले भी, वह सबसे पहले संपूर्ण भौतिक ऊर्जा, महा-तत्व को, अपने शरीर के रूप में स्वीकार करता है। इस प्रकार ब्रह्मा ब्रह्माण्ड द्वारा सन्निहित जीव है, और विष्णु परमात्मा है जो उससे जुड़ता है। ब्रह्मा को सृष्टि की विशिष्ट अभिव्यक्तियों का आयोजन करना चाहिए, लेकिन वह तब तक ऐसा करना शुरू नहीं कर सकता जब तक कि भगवान विष्णु स्वयं को फिर से क्रिया की सूक्ष्म ऊर्जा में विस्तारित नहीं करते - जो सूत्र-तत्व या मूल महत्वपूर्ण हवा है - और चेतना की रचनात्मक ऊर्जा में भी, बुद्धि-तत्व है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)