कृपया मुझ पर कृपा करें, ताकि मैं गृहस्थ के अंधे कूप—अपने झूठे घर—से बाहर निकल सकूं और आपके चरणकमलों की सच्ची शरण ढूंढ सकूं, जिसकी तलाश निस्वार्थ संत हमेशा करते रहते हैं। तब मैं या तो अकेले या सभी के मित्र स्वरूप महान् संतों की संगति में खुलकर विचरण कर सकूँ और वसुंधरा को दान देने वाले वृक्षों के नीचे जीवनयापन कर सकूँ।
Kindly be merciful to me, so that I may come out of the dark well of domestic life—my false home—and take true refuge in Your feet, which the selfless sages always seek. Then I may roam freely either alone or with the great saints who are the friend of all, and fulfill the necessities of life under the trees that give charity to the whole world.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि बली की प्रार्थनाओं के जवाब में, श्री कृष्ण ने उन्हें कुछ वरदान चुनने के लिए आमंत्रित किया, और इस श्लोक में बली अपना अनुरोध प्रस्तुत करते हैं। बली मांग करता है कि भौतिक जीवन की उलझन से मुक्त होकर वह घर छोड़कर जंगल में विचरण करे, केवल भगवान के चरण कमलों को अपने आश्रय के रूप में रखे। अपने निर्वाह के लिए, बली प्रस्ताव करता है, वह जंगल के पेड़ों से सहायता लेगा, जिनके पैरों में खाने के लिए फल और सोने के लिए पत्ते होते हैं, जिसे सभी को आवश्यकतानुसार उपयोग करना चाहिए। और यदि प्रभु उस पर विशेष रूप से दया करते हैं, बलि उम्मीद करता है, उसे अकेले भटकना नहीं पड़ेगा बल्कि उसे भगवान कृष्ण के भक्तों की संगति में यात्रा करने की अनुमति होगी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥