श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 85: कृष्ण द्वारा वसुदेव को उपदेश दिया जाना तथा देवकी-पुत्रों की वापसी  »  श्लोक 41-43
 
 
श्लोक  10.85.41-43 
दैत्यदानवगन्धर्वा: सिद्धविद्याध्रचारणा: ।
यक्षरक्ष:पिशाचाश्च भूतप्रमथनायका: ॥ ४१ ॥
विशुद्धसत्त्वधाम्न्यद्धा त्वयि शास्‍त्रशरीरिणि ।
नित्यं निबद्धवैरास्ते वयं चान्ये च ताद‍ृशा: ॥ ४२ ॥
केचनोद्बद्धवैरेण भक्त्या केचन कामत: ।
न तथा सत्त्वसंरब्धा: सन्निकृष्टा: सुरादय: ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
वे अनेक लोग जो आपसे शत्रुता में लगे रहते थे, अंततः आपकी ओर आकर्षित हुए, क्योंकि आप शुद्ध सत्त्व गुण के साक्षात रूप हैं और आपका दिव्य रूप शास्त्रों से पूर्ण है। इन सुधरे हुए शत्रुओं में दैत्य, दानव, गंधर्व, सिद्ध, विद्याधर, चारण, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत, प्रमथ और नायक और हम तथा हमारे जैसे अनेक लोग शामिल हैं। हममें से कुछ विशेष घृणा के कारण और कुछ काम-वासना पर आधारित भक्तिभाव से आपकी ओर आकर्षित हुए हैं। परन्तु देवता और भौतिक सतोगुण से मोहित अन्य लोग आपके प्रति ऐसा आकर्षण महसूस नहीं कर पाते।
 
Many who were constantly engaged in hostility towards You have finally been attracted to You because You are the embodiment of pure Sattva Guna and Your transcendental form is accompanied by the scriptures. These reformed enemies include Daityas, Danavas, Gandharvas, Siddhas, Vidyadharas, Charanas, Yakshas, ​​Rakshasas, Pishachas, Bhutas, Pramathas and Nayaks, and we and many others like us. Some of us have been attracted to You out of special hatred and some out of devotion based on lust. But the demigods and others who are captivated by material Sattva Guna do not experience the same attraction towards You.
तात्पर्य
श्रील जिव गोस्वामी इस श्लोक की व्याख्या इस प्रकार करते हैं: गंधर्व, सिद्ध, विद्याधर एवं चारण जब दैत्य और दानव राक्षसों के नेतृत्व का पालन करते हैं तो वे परमेश्वर के विरोधी बन जाते हैं। यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि प्रायः शत्रुभाव रखते हैं क्योंकि सामान्यतया वे अज्ञान से आच्छादित रहते हैं। शुद्ध अज्ञान में कुछ पापी होते हैं जैसे शिशुपाल और पौंड्रक, जो परमात्मा को शत्रु मानकर ही उनका ध्यान करते हैं और यह दृढ़ चेतना उन्हें मुक्ति दिलाती है। अन्य लोग रज और तम के मिश्रित स्वरूप में ईश्वर से पद और प्रतिष्ठा की अभिलाषा लेकर संगति करते हैं; महाराज बलि स्वयं को इसी श्रेणी का मानते हैं। फिर भी भगवान विष्णु ने बलि के द्वारपाल बनकर सुतल लोक में उसी प्रकार उन पर अनुग्रह किया जैसे उन्होंने दानवों के वध और मुक्ति प्रदान करके उन पर अनुग्रह किया था और गंधर्वों के साथ उनकी महिमा का गान कराके उन पर अनुग्रह किया। दूसरी ओर, भगवान उन देवताओं को भोग प्रदान करते हैं जो सत्वगुण में स्थित होने का गर्व करते हैं; इस प्रकार वे मोहग्रस्त होकर उन्हें भूल जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)