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bhagavat 10.85.32-33: यह कहा जाता है कि जब आपके गुरु ने अपने बहुत पहले मर चुके पुत्र को वापस लाने के लिए आपको आदेश दिया, तो आप गुरु-दक्षिणा के प्रतीक रूप में उसे पूर्वजों के धाम से वापस ले आये। हे योगेश्वरों के भी ईश्वर, मेरी इच्छा को भी उसी तरह पूरी कीजिये। कृपया भोजराज द्वारा मारे गये मेरे पुत्रों को वापस लाइये, जिससे मैं उन्हें फिर से देख सकूँ।   |   bhagavat अध्याय 10.85: कृष्ण द्वारा वसुदेव को उपदेश दिया जाना तथा देवकी-पुत्रों की वापसी   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 85: कृष्ण द्वारा वसुदेव को उपदेश दिया जाना तथा देवकी-पुत्रों की वापसी  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  10.85.32-33 
चिरान्मृतसुतादाने गुरुणा किल चोदितौ ।
आनिन्यथु: पितृस्थानाद् गुरवे गुरुदक्षिणाम् ॥ ३२ ॥
तथा मे कुरुतं कामं युवां योगेश्वरेश्वरौ ।
भोजराजहतान् पुत्रान् कामये द्रष्टुमाहृतान् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
यह कहा जाता है कि जब आपके गुरु ने अपने बहुत पहले मर चुके पुत्र को वापस लाने के लिए आपको आदेश दिया, तो आप गुरु-दक्षिणा के प्रतीक रूप में उसे पूर्वजों के धाम से वापस ले आये। हे योगेश्वरों के भी ईश्वर, मेरी इच्छा को भी उसी तरह पूरी कीजिये। कृपया भोजराज द्वारा मारे गये मेरे पुत्रों को वापस लाइये, जिससे मैं उन्हें फिर से देख सकूँ।
 
It is said that when your Guru ordered you to bring back his son who had died long ago, you brought him back from the abode of the ancestors as a token of Guru-dakshina. O Lord of all Yogeshwaras, please fulfill my wish in the same way. Please bring back my sons killed by Bhojaraj so that I can see them again.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)