अहं यूयमसावार्य इमे च द्वारकौकस: ।
सर्वेऽप्येवं यदुश्रेष्ठ विमृग्या: सचराचरम् ॥ २३ ॥
अनुवाद
हे यदुश्रेष्ठ, मैं, आप, मेरे पूज्य भ्राता और ये द्वारकावासी सभी को इसी दार्शनिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। दरअसल, हमें संपूर्ण सृष्टि, चाहे वह चेतन हो या जड़, को इसमें शामिल करना चाहिए।
O best of the Yadus, not only me, but you, my revered brother and these residents of Dwaraka should also be seen in this philosophical light. In fact, we should include the entire creation, both inanimate and sentient.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण अपने माता-पिता के साथ घनिष्ठ संबंधों की रक्षा के लिए इस कथन द्वारा अपने पिता वसुदेव के लिए अस्तित्व की एकता पर जोर देते हैं। वसुदेव अपने पुत्रों की महानता को कुरुक्षेत्र में एकत्रित हुए साधु-संतों को सुनकर याद दिलाया गया था। परंतु उनके विस्मय की भावना ने कृष्ण के साथ घनिष्ठ माता-पिता के संबंध को भंग किया, और इसलिए कृष्ण इसे दूर करना चाहते थे। हम भगवान कृष्ण के द्वारा यहां बोली गई “एकता” को गलत नहीं समझना चाहिए। उपनिषदों के सूक्ष्म शब्द अक्सर निराकारवादियों को यह मानने के लिए भ्रमित करते हैं कि सारा अस्तित्व अक्षरतः एक है, अंतिम मुद्दे में किसी भी किस्म की विविधता के बिना। कुछ उपनिषद मंत्र भगवान और उनकी रचना की समानता पर जोर देते हैं, जबकि अन्य उनके अंतर के बारे में बताते हैं। उदाहरण के लिए तत् त्वम् असि श्वेताकेतो (“हे श्वेताकेतु, तुम वही हो”), एक अभेद-वाक्य है, एक मंत्र यह पुष्टि करता है कि सारी चीजें भगवान के साथ एक है, उनका आश्रित विस्तार होने के नाते। परंतु उपनिषदों में कई भेद-वाक्य भी होते हैं, ऐसे कथन जो सर्वोच्च के विशिष्ट, विशिष्ठ गुणों की पुष्टि करते हैं, जैसे यह कथन: क एवान्यात कह प्रणियाद यद्य एष आकाश आनंदो न स्यात, एष एवानंदयति। इस अनंत सर्वोच्च का आनंद लेने वाला यदि मूल न होता तो सृष्टि को सक्रिय करने और सभी प्राणियों को जीवन देने वाला कौन होता? निश्चय ही, वह अकेला सभी सुख का स्रोत है। "(तैत्तिरीय उपनिषद। 2.7.1) सर्वोच्च प्रभु की विलक्षण माया के प्रभाव से, ईर्ष्यालु निराकारवादी अभेद-वाक्यों को शाब्दिक रूप से पढ़ते हैं और भेद-वाक्यों को केवल एक आलंकारिक तरीके से स्वीकार करते हैं। दूसरी ओर, आधिकारिक वैष्णव टीकाकार, वैदिक मीमांसा के व्याख्यात्मक सिद्धांतों और वेदांत के तार्किक रूप से स्थापित निष्कर्षों के अनुसार स्पष्ट विरोधाभासों को सावधानीपूर्वक समेटते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥