युवां न न: सुतौ साक्षात् प्रधानपुरुषेश्वरौ ।
भूभारक्षत्रक्षपण अवतीर्णौ तथात्थ ह ॥ १८ ॥
अनुवाद
तुम हमारे बेटे नहीं हो, बल्कि प्रकृति और उसके निर्माता दोनों के ही स्वामी हो। तुम दोनों ने जैसा कि तुमने हमें स्वयं बताया है, पृथ्वी को उन शासकों से मुक्त करने के लिए अवतार लिया है, जो उस पर बहुत बड़ा बोझ बने हुए हैं।
You both are not our sons, but the masters of both nature and its creator (Mahavishnu). As you yourself have told us, you have descended to free the earth from those rulers who have become a great burden on it.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, इस श्लोक में वसुदेव भौतिक रूप से भ्रमित व्यक्तियों के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में स्वयं और अपनी पत्नी को प्रस्तुत करते हैं। यद्यपि कंसा के कारागार में जन्म के समय भगवान कृष्ण ने वसुदेव और देवकी को बताया था कि उनका मिशन पृथ्वी को अवांछित क्षत्रियों से मुक्त करना है, फिर भी उनके माता-पिता उन्हें अपने असहाय पुत्र के रूप में सोचने से नहीं रोक सके, जिन्हें राजा कंस से सुरक्षा की आवश्यकता थी। वास्तव में, निश्चित रूप से, वसुदेव और देवकी दोनों ही भगवान की जन्म लीला में भाग ले रहे थे जो उनकी आंतरिक ऊर्जा के पूर्ण निर्देशन में थी; केवल अलौकिक विनम्रता से ही वसुदेव ने इस प्रकार से स्वयं की आलोचना की है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥