श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 84: कुरुक्षेत्र में ऋषियों के उपदेश  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  10.84.64 
मा राज्यश्रीरभूत् पुंस: श्रेयस्कामस्य मानद ।
स्वजनानुत बन्धून् वा न पश्यति ययान्धद‍ृक् ॥ ६४ ॥
 
 
अनुवाद
हे आदरणीय, मेरी प्रार्थना है कि वह व्यक्ति जो जीवन में सबसे अधिक लाभ पाना चाहता है, उसे कभी भी राजसी ऐश्वर्य न मिले, क्योंकि यह उसे उसके अपने परिवार और मित्रों की आवश्यकताओं के प्रति अंधा बना देता है।
 
O Most Revered One, may God ensure that those who seek the highest benefits in life never acquire royal opulence, for this makes them blind to the needs of their family and friends.
तात्पर्य
यह तो था ही, अपने अगाध विनय के कारण कि वसुदेव स्वयं को कोस रहे थे, पर ऐश्वर्य का उनका खण्डन सामान्यतः मान्य था। इस कांड में पहले नारद मुनि ने नलकूवर और मणिग्रीव की तीखी आलोचना की थी, जो कुबेर के दो धनवान बेटे थे, जो स्वर्ग के कोषाध्यक्ष थे। अभिमान और मदिरा दोनों के नशे में चूर, दोनों उचित तरीके से नारद का स्वागत करने में विफल रहे, जब वह उनसे भेंटे जब वे कुछ युवतियों के साथ निर्वस्त्र होकर मंदाकिनी नदी में विहार कर रहे थे। उनकी शर्मनाक अवस्था में उन्हें देखकर, नारद ने कहा,

न ह्य अन्यो जुषतो जोष्याँ

बुद्धि-भ्रंशो रजो-गुणः

श्री-मदाद अभिजात्यादिर

यत्र स्त्री द्युत आषवः

"भौतिक सुख के सभी आकर्षणों में, धन का आकर्षण खूबसूरत शारीरिक बनावट, एक अभिजात परिवार में जन्म, और शिक्षित होने से भी अधिक है। जब कोई अशिक्षित होता है लेकिन झूठे तौर पर धन के मद में चूर रहता है, तो परिणाम यह होता है कि वह धन को शराब, महिलाओं और जुए में लगा देता है।" (भाग। 10.10.8)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)