श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 84: कुरुक्षेत्र में ऋषियों के उपदेश  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  10.84.42 
श्रीशुक उवाच
इति तद्वचनं श्रुत्वा वसुदेवो महामना: ।
तानृषीनृत्विजो वव्रे मूर्ध्नानम्य प्रसाद्य च ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: ऋषियों की इन बातों को सुनकर दयालु वसुदेव ने भूमि पर अपना सिर झुकाया और उनकी प्रशंसा करते हुए उनसे प्रार्थना की कि वे उनके पुरोहित बन जाएँ।
 
Sukadeva Goswami said: Hearing these statements of the sages, the generous Vasudeva bowed his head down to the ground and, praising them, requested them to become his priests.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)