श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 84: कुरुक्षेत्र में ऋषियों के उपदेश  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  10.84.41 
वसुदेव भवान् नूनं भक्त्या परमया हरिम् ।
जगतामीश्वरं प्रार्च: स यद् वां पुत्रतां गत: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
हे वसुदेव, निस्संदेह आपने इसके पहले समस्त जगतों के प्रभु भगवान हरि की पूजा की होगी। आप और आपकी पत्नी दोनों ने परम भक्ति से उनकी पूर्ण रूप से आराधना की होगी, तभी तो उन्होंने आपकी पुत्र रूप में भूमिका को स्वीकार किया है।
 
O Vasudeva, you must have undoubtedly worshipped Lord Hari, the Lord of all the worlds, before this. Both you and your wife must have worshipped Him fully with utmost devotion, since He has accepted the role of your son.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ऋषियों के मन उदगारों की इस तरह व्याख्या करते हैं: "हमने आपको सामान्य बातचीत के तरीके से ही प्रश्न किया था, और उसी साधारण तरीके से उत्तर भी दिए। हालाँकि, सच्चाई तो यह है कि, आप सर्वोच्च भगवान के चिरमुक्त पिता हैं, इसलिए ना तो सांसारिक रीति-रिवाज और ना ही शास्त्रों के नियम आप पर अधिकार रखते हैं।"

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, वासुदेव शब्द ही यह इंगित करता है कि वासुदेव दिव्य (दीप्यमान) रूप से शुद्ध भक्ति भावना के श्रेष्ठ संपदा (वसु) को प्रकट करते हैं। ग्यारहवें सर्ग में नारद जी पुन: वासुदेव से मिलेंगे और उन्हें उस समय याद दिलाएँगे,

देवर्षि-भूताप्त-नृणां पितृणां

न किंकरो नाम ऋणी च राजन्

सर्वत्मना यः शरणं शरण्यं

गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्

"हे राजन, जो सभी भौतिक कर्तव्यों को त्याग कर, मुकुंद के श्री चरण-कमलों में पूर्ण शरण ले लेता है, जो सभी को संरक्षण देता है, वह देवताओं, महान ऋषियों, आम जनमानस, संबंधियों, मित्रों, मानव जाति या यहाँ तक कि उन पूर्वजों का भी ऋणी नहीं रहता है जो दिवंगत हो चुके हैं। चूंकि ये सभी प्रकार के जीव सर्वोच्च भगवान के अभिन्न अंग हैं, इसलिए जो भगवान की सेवा में समर्पित हो गया है, उसे अलग से ऐसे व्यक्तियों की सेवा करने की कोई ज़रूरत नहीं है।" (भाग. 11.5.41)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)