श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, वासुदेव शब्द ही यह इंगित करता है कि वासुदेव दिव्य (दीप्यमान) रूप से शुद्ध भक्ति भावना के श्रेष्ठ संपदा (वसु) को प्रकट करते हैं। ग्यारहवें सर्ग में नारद जी पुन: वासुदेव से मिलेंगे और उन्हें उस समय याद दिलाएँगे,
देवर्षि-भूताप्त-नृणां पितृणां
न किंकरो नाम ऋणी च राजन्
सर्वत्मना यः शरणं शरण्यं
गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्
"हे राजन, जो सभी भौतिक कर्तव्यों को त्याग कर, मुकुंद के श्री चरण-कमलों में पूर्ण शरण ले लेता है, जो सभी को संरक्षण देता है, वह देवताओं, महान ऋषियों, आम जनमानस, संबंधियों, मित्रों, मानव जाति या यहाँ तक कि उन पूर्वजों का भी ऋणी नहीं रहता है जो दिवंगत हो चुके हैं। चूंकि ये सभी प्रकार के जीव सर्वोच्च भगवान के अभिन्न अंग हैं, इसलिए जो भगवान की सेवा में समर्पित हो गया है, उसे अलग से ऐसे व्यक्तियों की सेवा करने की कोई ज़रूरत नहीं है।" (भाग. 11.5.41)
