तस्याद्य ते ददृशिमाङ्घ्रिमघौघमर्ष-
तीर्थास्पदं हृदि कृतं सुविपक्वयोगै: ।
उत्सिक्तभक्त्युपहताशयजीवकोशा
आपुर्भवद्गतिमथानुगृहाण भक्तान् ॥ २६ ॥
अनुवाद
आज हमने आपके चरणों के दर्शन किए हैं, जो उस पवित्र गंगा नदी का उद्गम हैं जो अनेक पापों को धोती है। सिद्ध योगी आपके चरणों का ध्यान अपने हृदय में कर सकते हैं। परंतु केवल वे ही आपके चरणों में पहुँच पाते हैं जो पूरे मन से आपकी भक्ति करते हैं और इस प्रकार आत्मा के आवरण अर्थात् भौतिक मन को दूर करते हैं। अतः आप हम अपने भक्तों पर कृपा करें।
Today we have had a direct vision of Your feet, which are the source of the holy river Ganges, which washes away the multitudes of sins. Perfect Yogis can meditate on Your feet in their hearts in the best manner, but only those who worship You wholeheartedly and thus remove the veil of the soul—the material mind—attain You as their final destination. Therefore, please show mercy upon us, Your devotees.
तात्पर्य
पवित्र गंगा नदी में सभी प्रकार के पापों का नाश करने की शक्ति है क्योंकि उत्पत्ति यह भगवान के चरण कमलों से हुई है इस प्रकार यह उनकी चरणों की धूलि को धारण करती हैं। इस श्लोक को समझाते हुए श्रील श्रीधर स्वामी जी कहते हैं, "यदि भगवान ये सलाह दे सकते हैं कि उन्हें भक्ति संबंधी व्रतों की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे पहले से ही आध्यात्मिक ज्ञान और तपस्या में उन्नत हो चुके हैं, तो वे सम्मानपूर्वक इस तरह के सुझाव को अस्वीकार करते हुए यह बताते हैं कि केवल वे ही योगी भौतिक मन और अहंकार का नाश कर सकते हैं जो कृष्ण को शुद्ध भक्ति भाव से समर्पित हैं और पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। वे प्रभु से प्रार्थना करके निष्कर्ष निकालते हैं कि वे उन्हें सबसे दयालु तरीके से अपना भक्त बनाकर उन पर अनुग्रह करें।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥