श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 84: कुरुक्षेत्र में ऋषियों के उपदेश  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  10.84.22 
नमस्तस्मै भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे ।
स्वयोगमाययाच्छन्नमहिम्ने परमात्मने ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
हम उस अनंत बुद्धि वाले परमात्मा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हैं, जिन्होंने अपनी योगमाया से अपनी महानता को ढक कर रखा है।
 
We bow to the Supreme Being of infinite wisdom, that is, to the Supreme Personality of Godhead, Sri Krishna, who has concealed His greatness through His Yogamaya.
तात्पर्य
परमेश्वर की पूजा से प्राप्त होने वाले भावी लाभ के अतिरिक्त, किसी की निर्भरता और सेवा भाव को स्वीकृति के रूप में उन्हें प्रणाम करना प्रत्येक व्यक्ति का सबसे अनिवार्य दायित्व है। भगवान कृष्ण सलाह देते हैं,

मन-मना भव मद-भक्तो

मद-याजी माँ नमस्करु

माँ एवैषयसि युक्तैवम्

आत्मानं मत-परायणः

"अपना मन हमेशा मेरा चिन्तन करने में लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे प्रणाम करो और मेरी पूजा करो। मुझ में पूरी तरह से लीन होने पर, निश्चित रूप से तुम मुझ तक पहुँचोगे।” (भगवदगीता 9.34)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)