श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 84: कुरुक्षेत्र में ऋषियों के उपदेश  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  10.84.21 
अद्य नो जन्मसाफल्यं विद्यायास्तपसो द‍ृश: ।
त्वया सङ्गम्य सद्गत्या यदन्त: श्रेयसां पर: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
आज हमारा जन्म, विद्या, तप एवं दृष्टि सभी पूर्ण हो गये हैं क्योंकि हम समस्त संत पुरुषों के लक्ष्य आपके सान्निध्य को प्राप्त कर पाए हैं। निस्संदेह आप ही अनंत अर्थात परम आशीर्वाद हैं।
 
Today our birth, education, penance and vision have all been completed because we have been able to attain the goal of all saints, your association. Indeed, you yourself are the ultimate blessing.
तात्पर्य
यहाँ संत ईश्वर के प्रति अपने सम्मान को ईश्वर की उनसे की गई राहगीरी उपासना से भिन्न बताते हैं। भगवान कृष्ण बुद्धिमान पुरुषों को निर्देशित करने के साधन के रूप में ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं, जबकि वे वास्तव में पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं। दूसरी ओर, जो ब्राह्मण उनकी पूजा करते हैं, वे अपने लिए कल्पना से अधिक लाभ कमाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)