श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 84: कुरुक्षेत्र में ऋषियों के उपदेश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.84.17 
अनीह एतद् बहुधैक आत्मना
सृजत्यवत्यत्ति न बध्यते यथा ।
भौमैर्हि भूमिर्बहुनामरूपिणी
अहो विभूम्नश्चरितं विडम्बनम् ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
नि:संदेह, सर्वशक्तिमान की मनुष्य जैसी लीलाएँ मात्र स्वाँग हैं। वे सहज ही अपने स्वरूप से इस विविधतामय सृष्टि को जन्म देते हैं, इसका पालन करते हैं और फिर कुदरती रूप से उसे अपने में समाहित कर लेते हैं। यह सब वे ऐसे ही करते हैं, जैसे धरती तत्व अपने विभिन्न रूपांतरों में अनेक नाम और आकृतियाँ ग्रहण करता रहता है।
 
Of course, the human-like pastimes of the Almighty are only a pretext. He produces this colorful creation out of Himself without any effort, nurtures it and then swallows it up. You do all this without being bound, just as the earth-element assumes many names and forms in its various transformations (vikaras).
तात्पर्य
वह एक परम स्वयं को अनेक के रूप में विस्तारित करता है अपनी पूर्णता को कम किए बिना। वह यह सहजता से करता है किसी या किसी भी अन्य चीज पर निर्भर किए बिना। भगवान के आत्म-विस्तार की यह रहस्यमय प्रक्रिया उनके सिवाय अन्य सभी के लिए समझ से परे है, लेकिन पृथ्वी तत्व और उसके विविध उत्पादों का उदाहरण कुछ विचार प्रदान करने के लिए पर्याप्त समानता रखता है। चांडोग्य उपनिषद (6.1) के अक्सर उद्धृत अनुच्छेद में भी यही उदाहरण प्रस्तुत किया गया है, वाचारंभणं विकारो नामधेय मृत्तिकेति एव सत्यम्: "पृथ्वी के परिवर्तन केवल नामकरण की प्रक्रिया की मौखिक रचनाएँ हैं; पृथ्वी तत्व ही अकेले वास्तविक है।"

श्रीला श्रीधर स्वामी का सुझाव है कि श्रीमद्-भागवतम का यह श्लोक भगवान कृष्ण के एक संभावित आपत्ति का उत्तर देता है: "यदि मैं वासुदेव का पुत्र हूँ तो मैं ब्रह्मांड का निर्माण, पालन और विनाश कैसे कर सकता हूँ?" उत्तर शब्दों द्वारा दिया गया है अहो विभूमनश चरितं विडंबनम्: "आप पूर्ण पूर्ण संपूर्ण हैं और आपका जन्म और लीलाएँ भौतिक दुनिया में सामान्य व्यक्तियों की गतिविधियों की केवल एक नकल हैं। आप केवल उच्च नियंत्रण में होने का दिखावा करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)