कुछ समय तक मुनियों ने भगवान् के उस व्यवहार पर विचार किया, जो एक अधीनस्थ प्राणी के व्यवहार जैसा था। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि वे आम लोगों को शिक्षा देने के लिए इस प्रकार का व्यवहार कर रहे हैं। इसलिए वे मुस्कुराए और ब्रह्मांड के आध्यात्मिक गुरु से इस प्रकार बोले।
The sages pondered for some time over the Lord's conduct, which seemed like the conduct of a subordinate soul. They concluded that the Lord was acting in this way to instruct the common people. So they smiled and spoke to the Jagadguru as follows.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी ईशितव्यता शब्द को इस तरह समझाते हैं कि व्यक्ति स्वयं कोई कर्ता नहीं है, दूसरे शब्दों में, वह कर्म के कानून के अधीन है, उसे काम करना पड़ता है और अपने काम के नतीजों का अनुभव करना पड़ता है। संतों को संबोधित करते हुए, भगवान कृष्ण ने एक अधीनस्थ प्राणी की भूमिका को स्वीकार किया था ताकि पवित्र वैष्णवों को सुनने और उनकी सेवा करने के महत्व पर जोर दिया जा सके। ईश्वर का व्यक्तित्व भी आध्यात्मिक समर्पण का सर्वोच्च शिक्षक है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥